प्रथम टुडे
देश में वीआईपी संस्कृति समाप्त करने और अनधिकृत सायरनों पर रोक लगाने के दावे वर्षों से किए जा रहे हैं, लेकिन जबलपुर की सड़कों का नजारा कुछ और ही कहानी बयां करता दिखाई देता है। शहर में आज भी कई निजी वाहनों से सायरन की आवाजें सुनाई देती हैं, जिनका किसी आपातकालीन सेवा या अधिकृत सुरक्षा व्यवस्था से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं दिखता।
इन दिनों शहर में सबसे ज्यादा चर्चा एक ऐसे राजनीतिक पदाधिकारी के वाहन को लेकर है, जो हाल ही में संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने के बाद सुर्खियों में हैं। हालांकि जानकार बताते हैं कि उनके वाहन में सायरन आज से नहीं, बल्कि उस समय से सुनाई देता रहा है जब वे संगठन के युवा मोर्चा में पद पर थे। शहर के अनेक चौराहों और भीड़भाड़ वाले मार्गों पर वाहन के गुजरते ही वही सायरन सुनाई देता है, जो आमतौर पर पुलिस पायलट, सुरक्षा एस्कॉर्ट या विशेष सरकारी वाहनों में सुनाई देता है।
नियमों से ऊपर कौन?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वाहन निजी है, कोई शासकीय वाहन नहीं है और किसी आपातकालीन सेवा का हिस्सा भी नहीं है, तो आखिर ऐसे सायरन किस अधिकार से उपयोग किए जा रहे हैं? क्या सड़क पर विशेष पहचान बनाने के लिए नियमों को किनारे रखा जा सकता है?
शहरवासियों का कहना है कि कानून का पालन कराने वाली एजेंसियों को इस विषय पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। क्योंकि यदि आम नागरिक अपने वाहन में नियम विरुद्ध बदलाव करे तो कार्रवाई तत्काल होती है, लेकिन प्रभावशाली लोगों के मामले में अक्सर सवाल उठते हैं कि क्या नियमों का पैमाना अलग हो जाता है?
एक घटना जिसने आईना दिखाया
कुछ समय पहले इसी प्रकार के एक मामले को लेकर पत्रकारों और एक रसूखदार व्यक्ति के बीच विवाद की स्थिति बनी थी। मामला पुलिस तक पहुंचा। बाद में संबंधित व्यक्ति ने स्वीकार किया कि वाहन में लगा सायरन उचित नहीं था। उन्होंने न केवल सायरन हटवाया बल्कि पत्रकारों का धन्यवाद भी किया कि समय रहते उन्हें नियमों की जानकारी दी गई। यह उदाहरण बताता है कि गलती स्वीकार कर सुधार करना संभव है।
फिर कार्रवाई क्यों नहीं?
जब एक व्यक्ति नियम समझने के बाद सायरन हटवा सकता है, तो शहर में आज भी निजी वाहनों पर सुनाई देने वाली सायरन की आवाजों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं है, या फिर रसूख के आगे नियमों की आवाज दब जाती है?
जनता का सवाल
जबलपुर की जनता आज सिर्फ एक जवाब चाहती है—
क्या सायरन अब भी आपातकालीन सेवाओं की पहचान है, या फिर कुछ लोगों के लिए यह प्रभाव, पहुंच और सत्ता प्रदर्शन का साधन बन चुका है?
प्रशासन को इस सवाल का जवाब देना ही होगा, क्योंकि कानून की असली ताकत तभी साबित होती है जब वह आम और खास दोनों पर समान रूप से लागू हो।

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