आंकड़ों का बड़ा अंतर: आखिर सच क्या है?
प्रशासनिक जानकारी के अनुसार कुल 15 लोगों (6 मृत, 9 लापता) का हिसाब दिया जा रहा है। लेकिन एडवोकेट रोशन आनंद, जो स्वयं उस वक्त क्रूज पर मौजूद थे, उनका कहना है कि भीड़ कहीं ज्यादा थी। उनके अनुसार, विभाग की लापरवाही और कर्मचारियों की मिलीभगत से कई लोग बिना टिकट चढ़े थे, जिनका रिकॉर्ड सरकारी कागजों में है ही नहीं। यह गंभीर जांच का विषय है कि क्या प्रशासन अपनी नाकामी छुपाने के लिए संख्या कम बता रहा है?
मौत के मुहाने पर खड़ी थी भीड़
रोशन आनंद ने बताया कि जब क्रूज डगमगाने लगा और उसमें पानी भरने लगा, तब वहां मौजूद 40-42 लोगों में कोहराम मच गया। उन्होंने बताया, "हमने पानी बाहर फेंकने की कोशिश की, लोगों को ढांढस बंधाया, लेकिन प्रशासनिक चूक इतनी बड़ी थी कि कोई सुरक्षा उपकरण काम नहीं आया।" उनके अनुसार, पायलट का सबसे पहले कूदकर भागना साबित करता है कि वहां सुरक्षा के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की गई थी।
लापरवाही की इंतहा: मासूमों के शवों की स्थिति भयावह
जैसे-जैसे रेस्क्यू ऑपरेशन आगे बढ़ रहा है, सच्चाई और वीभत्स होती जा रही है। चश्मदीद के अनुसार, क्रूज पर बच्चे भी सवार थे। पानी से निकल रहे शवों की हालत देखकर यह स्पष्ट है कि यदि समय पर रेस्क्यू और सुरक्षा ब्रीफिंग दी गई होती, तो शायद इन मासूमों को बचाया जा सकता था।
प्रशासन से 'प्रथम टुडे' के चुभते सवाल:
- अगर चश्मदीद 40-42 लोगों की बात कह रहे हैं, तो प्रशासन का आंकड़ा 15 पर ही क्यों रुका है?
- क्या बिना टिकट सवार यात्रियों की जान की कोई कीमत नहीं है?
- क्या पर्यटन विभाग उन कर्मचारियों को बचा रहा है जिन्होंने अवैध तरीके से लोगों को क्रूज पर एंट्री दी?

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