जबलपुर | प्रथम टुडे ब्यूरो
शुक्रवार, 1 मई की वह सुबह जबलपुर के बरगी डैम के तट पर मौजूद हर शख्स के लिए कभी न भूलने वाला जख्म बन गई। लहरों की खामोशी के बीच जब रेस्क्यू टीम ने पानी की गहराई से एक शव को बाहर निकाला, तो वहां मौजूद पत्थर दिल इंसानों की भी चीख निकल गई। यह सिर्फ एक शव नहीं, बल्कि ममता की वह पराकाष्ठा थी, जिसे देख कुदरत भी शर्मसार हो जाए।
मौत के आगोश में भी 'कवच' बनी मां
हादसे का मंजर इतना खौफनाक था कि रेस्क्यू टीम के अनुभवी सदस्य भी सुबक पड़े। पानी के भीतर जब मां-बेटे मिले, तो वे एक-दूसरे से इस कदर लिपटे थे जैसे समय वहीं ठहर गया हो। जब चारों ओर काल रूपी जल ने घेरा होगा, तब उस मां ने अपनी आखिरी सांस की परवाह न करते हुए अपने 4 साल के कलेजे के टुकड़े को सीने से लगा लिया था।
ममता की आखिरी जंग के कुछ मार्मिक बिंदु:
एक लाइफ जैकेट, दो जिंदगियां: मां ने अपनी ममता के आंचल और एक ही लाइफ जैकेट में मासूम को इस तरह समेटा था, मानो वह यमराज से उसे छीन लेना चाहती हो।
अटूट बंधन: मौत के बाद भी मां के हाथ बच्चे की पीठ पर मजबूती से जकड़े हुए थे। रेस्क्यू टीम के लिए उन्हें अलग कर पाना रूह कंपा देने वाला अनुभव था।
खामोश चीख: वह दृश्य गवाही दे रहा था कि डूबते वक्त मां ने आखिरी शब्द शायद यही कहे होंगे— "डरो मत बेटा, मैं हूं ना।"
उजड़ गए कई आशियाने, पर अमर हो गई ये कहानी
बरगी डैम के इस भीषण हादसे ने कई घरों के चिराग बुझा दिए और कई परिवारों को उम्र भर का गम दे दिया। लेकिन इस मां-बेटे की कहानी ने एक अमिट लकीर खींच दी है। यह महज एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि उस जज्बे की दास्तां है जो यह बताती है कि एक मां के लिए उसका बच्चा उसकी पूरी कायनात होता है।
रेस्क्यू टीम के एक सदस्य ने रुंधे गले से कहा, "हमने कई ऑपरेशन किए हैं, लेकिन मौत के चेहरे पर ममता की ऐसी चमक पहले कभी नहीं देखी।"
प्रथम टुडे की श्रद्धांजलि
जंग अधूरी रही, सांसें टूट गईं, लेकिन मां की ममता जीत गई। वह हारकर भी अपने ममत्व को अमर कर गई। प्रथम टुडे इस महान ममता और हादसे में जान गंवाने वाले सभी मृतकों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

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