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Monday, October 19, 2026

मां दुर्गा के दर्शन भी अब टिकट के मोहताज!

 जबलपुर में भक्ति के नाम पर कैसी दुकानदारी? ₹10 से ₹20 में आम भक्त, ₹100 में VIP दर्शन—आस्था के दरबार में भी अमीर-गरीब की कतारें अलग!


चार दिन के दुर्गोत्सव में लाखों श्रद्धालु, लेकिन सवाल यह कि टिकट से जुटने वाला पैसा आखिर जाता कहां है?

जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर में दुर्गोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता का पर्व माना जाता है। मां दुर्गा के दर्शन के लिए श्रद्धालु परिवार सहित निकलते हैं, घंटों कतारों में खड़े रहते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार सहयोग भी करते हैं। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों से कुछ दुर्गा उत्सव समितियों में दर्शन के नाम पर टिकट लगाए जाने की व्यवस्था ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है—क्या अब मां के दरबार में भी दर्शन के लिए जेब का वजन देखा जाएगा?

शहर के कुछ पंडालों में आकर्षक दृश्य और सीन तैयार किए जाते हैं। इन्हें देखने के लिए आम श्रद्धालुओं से कथित तौर पर ₹10 से ₹20 तक का शुल्क लिया जा रहा है। वहीं एक पंडाल में ₹100 का वीआईपी टिकट होने की बात भी सामने आई है। इस व्यवस्था को लेकर भक्तों के बीच नाराजगी है। लोगों का सवाल है कि जब धार्मिक आयोजन जनता के सहयोग, चंदे और श्रद्धा से खड़े होते हैं, तो फिर दर्शन के नाम पर अलग से शुल्क क्यों?

आस्था के नाम पर टिकट, क्या यही है संस्कारधानी की परंपरा?

श्रद्धालुओं का कहना है कि जबलपुर में पहले दुर्गा दर्शन के लिए इस तरह टिकट की व्यवस्था आम तौर पर देखने को नहीं मिलती थी। भक्त पंडालों में जाते थे, मां के दर्शन करते थे और आयोजनों की सराहना करते थे। लेकिन अब कुछ जगहों पर दर्शन के रास्ते में टिकट की शर्त सामने आने से लोगों को यह महसूस हो रहा है कि धार्मिक आयोजन धीरे-धीरे व्यावसायिक स्वरूप लेते जा रहे हैं।

सवाल यह नहीं कि पंडाल सजाने में खर्च होता है या नहीं। भव्य सजावट, लाइटिंग, सुरक्षा, व्यवस्था और आकर्षक दृश्यों पर पैसा लगना स्वाभाविक है। सवाल यह है कि क्या इन खर्चों की भरपाई के लिए हर श्रद्धालु से दर्शन के नाम पर शुल्क लेना जरूरी है? अगर समिति को आर्थिक सहयोग चाहिए, तो स्वैच्छिक दान की व्यवस्था क्यों नहीं? श्रद्धालु अपनी इच्छा से जितना देना चाहें, उतना सहयोग करें। लेकिन जब शुल्क अनिवार्य हो, तो श्रद्धा और मजबूरी के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

₹100 का वीआईपी टिकट: क्या मां के दरबार में भी दो दर्जे?

एक पंडाल में ₹100 के वीआईपी टिकट की चर्चा ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। बताया जा रहा है कि इस टिकट के जरिए श्रद्धालुओं को लंबी कतार में खड़े हुए बिना दर्शन करने की सुविधा मिलती है। यदि यह व्यवस्था सही है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पैसे देने वाला भक्त विशेष है और सामान्य टिकट लेने वाला भक्त कम महत्वपूर्ण?

मां दुर्गा के दरबार में हर श्रद्धालु समान भाव से सिर झुकाता है। किसी के पास अधिक पैसा है, किसी के पास कम—लेकिन आस्था की कोई कीमत तय नहीं होती। फिर दर्शन की व्यवस्था में आर्थिक हैसियत के आधार पर प्राथमिकता देने का औचित्य क्या है? यदि भीड़ प्रबंधन के लिए अलग कतार बनाई गई है, तो उसकी पारदर्शिता और औचित्य भी जनता के सामने होना चाहिए।

नेताओं के लिए सहज रास्ता, जनता के हिस्से में कतार और टिकट!

इस पूरे मामले का एक और पहलू लोगों को खटक रहा है। जब शहर के बड़े नेता और जनप्रतिनिधि पंडालों में पहुंचते हैं, तो उन्हें आम श्रद्धालुओं की तरह टिकट लेकर कतार में खड़े होने की जरूरत पड़ती है या नहीं—यह सवाल चर्चा में है। लोगों का आरोप है कि नेताओं का स्वागत हाथ जोड़कर किया जाता है और वे सहजता से अंदर जाकर दर्शन कर लेते हैं, जबकि आम श्रद्धालु टिकट लेकर कतार में खड़े रहते हैं।

यहां सवाल किसी नेता के दर्शन करने पर नहीं, बल्कि समान व्यवस्था पर है। अगर समिति का नियम शुल्क और कतार का है, तो वह नियम सभी श्रद्धालुओं के लिए पारदर्शी होना चाहिए। अगर विशिष्ट व्यक्तियों को अलग सुविधा दी जाती है, तो आम जनता को भी बताया जाना चाहिए कि आखिर यह व्यवस्था किस आधार पर बनाई गई है।

जनता पूछ रही है—नेताओं के सामने नियम नरम और आम भक्तों के लिए सख्त क्यों? क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल पंडालों में पहुंचकर हाथ जोड़ने तक सीमित है, या उन्हें ऐसी व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाना चाहिए जो आम श्रद्धालुओं को परेशान कर रही हैं?


विशेष कॉलम | भाजपा नेताओं की अध्यक्षता वाली समितियों पर भी उठे सवाल

जब राजनीतिक पद और सामाजिक जिम्मेदारी साथ हों, तो जवाबदेही भी जरूरी

शहर की दो दुर्गा उत्सव समितियों को लेकर विशेष चर्चा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इनमें एक सिविल लाइंस क्षेत्र की समिति और दूसरी यादव कॉलोनी के सामने स्थित क्षेत्र की समिति है। आरोप है कि इन समितियों में भाजपा से जुड़े नेता अध्यक्ष की भूमिका में हैं। इनमें एक नगर भाजपा कार्यकारिणी से जुड़ा पदाधिकारी बताया जा रहा है, जबकि दूसरे नेता भाजपा के वरिष्ठ नेता और कई बार पार्षद रह चुके हैं।

ऐसे में सवाल और गंभीर हो जाता है। भाजपा से जुड़े नेताओं और जनप्रतिनिधियों से जनता की अपेक्षा रहती है कि वे धार्मिक आयोजनों को जनसहभागिता, सेवा और सामाजिक समरसता का माध्यम बनाएं। यदि उनकी अध्यक्षता वाली समितियों में भी दर्शन के लिए शुल्क लिया जा रहा है, तो उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह व्यवस्था क्यों बनाई गई है, इससे कितनी राशि एकत्र होती है और उस राशि का उपयोग किस मद में किया जाता है।

यहां किसी नेता को केवल राजनीतिक संबद्धता के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी है कि वे उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब दें। पद चाहे राजनीतिक हो या सामाजिक, जनता के सवालों से ऊपर नहीं हो सकता।

यदि इन समितियों का उद्देश्य धार्मिक आयोजन को व्यवस्थित करना है, तो क्या सामान्य दर्शन को निःशुल्क रखते हुए स्वैच्छिक सहयोग नहीं लिया जा सकता? और यदि टिकट से राशि जुटाई जा रही है, तो क्या उसकी आय-व्यय का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए? इन सवालों पर समितियों का पक्ष सामने आना जरूरी है।

चंदा भी दो और दर्शन के लिए टिकट भी खरीदो!

स्थानीय श्रद्धालुओं की एक शिकायत यह भी है कि उन्होंने पहले ही समिति को चंदा दिया है, लेकिन दर्शन के समय उनसे अलग से टिकट मांगी जाती है। कुछ लोगों के अनुसार, चंदे की रसीद दिखाने पर निःशुल्क दर्शन की बात कही जाती है, लेकिन उसके लिए भी कतार में लगना पड़ता है।

यदि ऐसी व्यवस्था लागू है, तो समितियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि चंदा देने वाले व्यक्ति के लिए क्या नियम हैं और टिकट से छूट किन शर्तों पर मिलती है। चंदा स्वैच्छिक सहयोग है या टिकट से छूट पाने की अनिवार्य शर्त—इसमें स्पष्ट अंतर होना चाहिए।

भक्त का सवाल सीधा है—जब हमने आयोजन में पहले ही सहयोग दिया, तो दर्शन के समय दोबारा शुल्क देने की जरूरत क्यों पड़े? धार्मिक आयोजन में आर्थिक सहयोग का उद्देश्य आस्था को मजबूत करना होना चाहिए, न कि श्रद्धालुओं के मन में असंतोष पैदा करना।

अब जरा हिसाब भी समझिए: चार दिन में कितनी राशि जुट सकती है?

यदि किसी समिति में प्रतिदिन 2,000 से 3,000 श्रद्धालु शुल्क देकर दर्शन करते हैं और प्रति व्यक्ति टिकट ₹10 की है, तो केवल टिकट से संभावित दैनिक संग्रह इस प्रकार होगा:

  • 2,000 श्रद्धालु × ₹10 = ₹20,000 प्रतिदिन।
  • 3,000 श्रद्धालु × ₹10 = ₹30,000 प्रतिदिन।
  • चार दिन में संभावित संग्रह = ₹80,000 से ₹1,20,000।

यदि टिकट ₹20 की है, तो समान संख्या में श्रद्धालुओं के आधार पर चार दिन का संभावित संग्रह ₹1.60 लाख से ₹2.40 लाख तक हो सकता है।

यह गणना केवल उदाहरण के लिए है। इसमें वास्तविक टिकट बिक्री, अलग-अलग दरों, निःशुल्क प्रवेश, वीआईपी टिकट और अन्य खर्चों का सत्यापित विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे किसी समिति की वास्तविक आय नहीं माना जा सकता। फिर भी यह अनुमान बताता है कि बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं से छोटी-छोटी राशि जुटने पर कुल रकम काफी हो सकती है।

यही कारण है कि समितियों को टिकटों की संख्या, दरों, कुल प्राप्त राशि और आयोजन पर हुए खर्च का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि धार्मिक आयोजन के नाम पर जुटाए गए सहयोग का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है।

प्रशासन और आयोजन समितियां जवाब दें

दुर्गोत्सव में भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा के लिए व्यवस्थाएं जरूरी हैं। लेकिन दर्शन के नाम पर टिकट लेने की व्यवस्था का स्वरूप क्या है, क्या यह केवल दृश्य देखने का शुल्क है या मां के दर्शन तक पहुंचने के लिए अनिवार्य भुगतान, और क्या इसकी शर्तें पहले से स्पष्ट की जाती हैं—इन सभी बातों पर स्थिति साफ होनी चाहिए।

प्रशासन को भी यह देखना चाहिए कि आयोजन स्थलों पर प्रवेश व्यवस्था पारदर्शी है या नहीं, श्रद्धालुओं को अनावश्यक परेशानी तो नहीं हो रही और टिकट संबंधी नियम स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किए जा रहे हैं या नहीं। जहां नियमों के उल्लंघन या अनुचित वसूली की शिकायत हो, वहां तथ्यों के आधार पर जांच होनी चाहिए।

अंतिम सवाल: उत्सव सेवा का है या कमाई का?

जबलपुर की पहचान धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं से है। दुर्गा उत्सव में सजावट हो, आकर्षक दृश्य हों, भव्य पंडाल हों—इससे किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन जब आम श्रद्धालु दर्शन के नाम पर टिकट देने को मजबूर महसूस करें, जब चंदा देने के बाद भी अतिरिक्त शुल्क की शिकायत सामने आए और जब वीआईपी टिकट के जरिए कतार से छूट मिलने की चर्चा हो, तो सवाल पूछना जरूरी हो जाता है।

मां के दरबार में श्रद्धा बड़ी होनी चाहिए, टिकट की कीमत नहीं।

समितियों को स्पष्ट करना चाहिए कि दर्शन के नाम पर शुल्क क्यों लिया जा रहा है, वीआईपी टिकट का आधार क्या है और एकत्र राशि का हिसाब कहां है। यदि उद्देश्य केवल व्यवस्था और खर्चों की पूर्ति है, तो पारदर्शिता और स्वैच्छिक सहयोग का रास्ता अपनाया जा सकता है।

आखिर दुर्गोत्सव जनता की आस्था से जीवित है। यदि उसी जनता को दर्शन के लिए पैसे और कतारों की कसौटी पर खड़ा किया जाएगा, तो यह सवाल उठेगा ही—भक्ति के इस पर्व में मां के दर्शन हो रहे हैं या आस्था का टिकट बेचा जा रहा है?

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