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Sunday, October 18, 2026

डीजे पर पुलिस की सख्ती से जनता को बड़ी राहत, कानफोड़ू शोर पर लगाम से खिले चेहरे

 हाई कोर्ट के आदेश के बाद जबलपुर पुलिस की लगातार कार्रवाई का असर, आम आदमी से व्यापारी वर्ग तक कर रहा राहत महसूस; विरोध-प्रदर्शन के बीच भी कार्रवाई जारी रखने की उठी मांग


जबलपुर। शहर में डीजे की तेज आवाज को लेकर लंबे समय से चली आ रही परेशानी के बीच जबलपुर पुलिस द्वारा हाई कोर्ट के आदेश के बाद की जा रही कार्रवाई अब आम जनता के बीच राहत का विषय बन गई है। जिन लोगों के लिए धार्मिक आयोजन और त्योहारों के दौरान बजने वाले डीजे की तेज आवाज परेशानी का कारण बन गई थी, उन्हें अब उम्मीद दिखाई देने लगी है कि शहर में ध्वनि प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो सकेगा। आम नागरिकों से लेकर व्यापारियों तक का कहना है कि त्योहारों की खुशी और धार्मिक आयोजनों की आड़ में दूसरों की शांति भंग करने की छूट किसी को नहीं मिलनी चाहिए। पुलिस की कार्रवाई को इसी नजरिए से देखा जा रहा है कि आखिरकार किसी ने तो आम आदमी की परेशानी को गंभीरता से लिया।

राहत मिली तो पुलिस के प्रति आभार भी जता रहे लोग

जनता की परेशानी को समझने की जरूरत थी। शहर में लंबे समय से तेज आवाज वाले डीजे को लेकर लोगों के बीच असंतोष बना हुआ था। कई बार लोग इसे लेकर आपस में चर्चा करते थे, लेकिन समस्या का प्रभावी समाधान होता दिखाई नहीं देता था। अब जब पुलिस ने लगातार कार्रवाई शुरू की है, तो प्रभावित लोगों में संतोष का माहौल है। नागरिकों का मानना है कि कानून का पालन कराने के लिए पुलिस का सक्रिय होना जरूरी है। यदि किसी कार्रवाई से आम जनता को राहत मिलती है और लोगों को शांतिपूर्ण वातावरण उपलब्ध होता है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। यही कारण है कि डीजे पर नियंत्रण की कार्रवाई को अनेक लोग जनहित में उठाया गया कदम मान रहे हैं।

व्यापारियों को भी मिली राहत, तेज आवाज से प्रभावित होता था कारोबार

दुकान पर ग्राहक से बात करना तक हो जाता था मुश्किल। डीजे की तेज आवाज से केवल घरों में रहने वाले लोग ही परेशान नहीं होते, बल्कि बाजारों में अपना कारोबार करने वाले व्यापारी भी इससे प्रभावित होते हैं। दुकानों के आसपास तेज संगीत बजने से ग्राहकों से बातचीत करने, फोन पर व्यावसायिक चर्चा करने और सामान्य कामकाज में बाधा उत्पन्न हो सकती है। कई कारोबारी ऐसे आयोजनों के दौरान होने वाले शोर को लेकर असहज महसूस करते रहे हैं। उनके लिए कारोबार चलाना जरूरी है, लेकिन तेज आवाज के कारण कामकाज प्रभावित होना भी एक वास्तविक समस्या है। ऐसे में पुलिस की कार्रवाई से राहत मिलने की उम्मीद ने व्यापारियों को भी इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखने का अवसर दिया है।

पहले भी आते थे नवरात्र, पहले भी मनाए जाते थे धार्मिक उत्सव

जब त्योहार मनाने में कोई कमी नहीं थी, तो आज इतना शोर क्यों? डीजे के समर्थन और विरोध के बीच शहर के नागरिक एक अहम सवाल उठा रहे हैं कि क्या पहले नवरात्र नहीं आते थे? क्या दुर्गा उत्सव, गणेश उत्सव, धार्मिक जुलूस और दूसरे सामाजिक कार्यक्रम नहीं होते थे? निश्चित रूप से होते थे और पूरे उत्साह के साथ मनाए जाते थे। उस समय लाउडस्पीकर के माध्यम से भजन, आरती और धार्मिक गीत सुनाए जाते थे। लोग परिवार के साथ कार्यक्रमों में शामिल होते थे और धार्मिक आयोजनों का आनंद लेते थे। त्योहारों की रौनक भी रहती थी और सामाजिक सहभागिता भी बनी रहती थी। लोगों का कहना है कि जब सीमित ध्वनि व्यवस्था के साथ धार्मिक आयोजन सफलतापूर्वक होते रहे, तो आज उत्सव की भव्यता को तेज आवाज से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति पर विचार करना जरूरी है।

लाउडस्पीकर से बॉक्स साउंड और फिर डीजे तक पहुंचा शोर का सफर

तकनीक बदली, लेकिन आवाज की सीमा भूलते चले गए लोग। समय के साथ ध्वनि उपकरणों में बदलाव आया। सामान्य लाउडस्पीकर के बाद बॉक्स साउंड का प्रचलन बढ़ा और फिर बड़े-बड़े डीजे सिस्टम धार्मिक तथा सामाजिक आयोजनों का हिस्सा बनने लगे। शुरुआत में यह बदलाव लोगों को आकर्षक लगा। नई तकनीक, तेज संगीत और अलग-अलग धुनों ने युवाओं को प्रभावित किया। धीरे-धीरे कुछ आयोजनों में आवाज की तीव्रता बढ़ाने की होड़ भी दिखाई देने लगी। समस्या तब पैदा हुई, जब संगीत का आनंद लेने और दूसरों को भी उसे सुनने के लिए मजबूर कर देने के बीच का अंतर भुला दिया गया। लोगों का कहना है कि तकनीक का इस्तेमाल गलत नहीं है, लेकिन उसकी वजह से आम नागरिकों की शांति प्रभावित होना निश्चित रूप से चिंता का विषय है।

मजाक में कहते हैं लोग—आखिर किसने बनाया यह डीजे!

हंसी-मजाक में कही जाने वाली बात के पीछे छिपी है गंभीर परेशानी। शहर में तेज आवाज से परेशान लोग कभी-कभी व्यंग्य में कहते हैं कि आखिर इस डीजे को बनाया किसने है, जिसने उत्सवों की खुशी के साथ इतनी बड़ी परेशानी भी जोड़ दी! यह बात भले ही मजाक में कही जाती हो, लेकिन इसके पीछे लोगों की वास्तविक परेशानी छिपी है। किसी को रात में आराम करना है, किसी विद्यार्थी को परीक्षा की तैयारी करनी है, किसी बुजुर्ग को शांति चाहिए और किसी बीमार व्यक्ति को सुकून भरा वातावरण। ऐसे में जब तेज आवाज लंबे समय तक आसपास गूंजती है, तो लोगों की नाराजगी स्वाभाविक है। सवाल डीजे के अस्तित्व का नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल में जिम्मेदारी और निर्धारित नियमों के पालन का है।

ध्वनि प्रदूषण का असर केवल कानों तक सीमित नहीं

तेज आवाज से नींद, तनाव और स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है असर। ध्वनि प्रदूषण को कई बार सामान्य परेशानी मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि अत्यधिक या लगातार शोर सुनने की क्षमता, नींद, एकाग्रता और मानसिक सुकून को प्रभावित कर सकता है। हृदय रोग से पीड़ित लोगों, बुजुर्गों, छोटे बच्चों और पहले से बीमार व्यक्तियों के लिए तेज आवाज का वातावरण विशेष रूप से असहज हो सकता है। ऐसे लोगों को सामान्य दिनचर्या में भी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि ध्वनि प्रदूषण केवल मनोरंजन या पसंद का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा भी है। किसी आयोजन में शामिल लोग संगीत का आनंद ले रहे हों, लेकिन उसी आवाज से आसपास के घरों में रहने वाले लोग परेशान हो रहे हों, तो इस स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हृदय रोगियों और बुजुर्गों की परेशानी को भी समझना होगा

उत्सव की खुशी किसी दूसरे के लिए तकलीफ नहीं बननी चाहिए। शहर में ऐसे अनेक परिवार रहते हैं, जिनमें बुजुर्ग या गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोग हैं। उन्हें आराम, पर्याप्त नींद और शांत वातावरण की जरूरत होती है। इसी तरह विद्यार्थियों की पढ़ाई, बच्चों की नींद और कामकाजी लोगों की दिनचर्या भी तेज आवाज से प्रभावित हो सकती है। नागरिकों का कहना है कि धार्मिक आयोजनों का उद्देश्य लोगों को जोड़ना और खुशियां बांटना है। यदि उन्हीं आयोजनों के कारण किसी दूसरे परिवार को परेशानी उठानी पड़े, तो आयोजकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। दूसरों की सुविधा का ध्यान रखना सामाजिक सद्भाव की बुनियादी शर्त है।

गोरखपुर थाना सहित अन्य क्षेत्रों में प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई जारी

विरोध के बीच भी नियमों का पालन कराने की चुनौती। डीजे पर कार्रवाई के बीच कल गोरखपुर थाना क्षेत्र सहित अन्य थाना क्षेत्रों में कुछ लोगों द्वारा प्रदर्शन किए जाने की बात सामने आई। इस घटनाक्रम के बावजूद पुलिस द्वारा कार्रवाई जारी रखने को लेकर शहर में चर्चा है। ऐसे मामलों में पुलिस के सामने चुनौती यह रहती है कि कानून का पालन भी सुनिश्चित हो और स्थिति को अनावश्यक तनावपूर्ण होने से भी बचाया जाए। किसी कार्रवाई को लेकर संबंधित पक्षों की अपनी आपत्तियां हो सकती हैं, जिन्हें कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से प्रशासन के सामने रखा जा सकता है। लेकिन न्यायालय के आदेश और लागू नियमों के पालन का सवाल हो, तो उसका समाधान भी कानून के दायरे में ही होना चाहिए। यहां जरूरी है कि किसी भी पक्ष की बात सुने बिना निष्कर्ष न निकाला जाए और कार्रवाई तथ्यों तथा नियमों के आधार पर की जाए।

राजनीतिक दबाव से परे निष्पक्ष कार्रवाई ही पुलिस की असली परीक्षा

कानून सबके लिए एक समान होना चाहिए। डीजे पर कार्रवाई को लेकर जनता के बीच यह मांग भी उठ रही है कि पुलिस का अभियान किसी व्यक्ति, संगठन, धार्मिक आयोजन या प्रभावशाली वर्ग तक सीमित नहीं होना चाहिए। नियमों का उल्लंघन जहां भी हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। पुलिस की निष्पक्षता इसी बात से साबित होगी कि कानून को समान रूप से लागू किया जाए। किसी भी तरह का दबाव, प्रभाव या विरोध कानून के पालन में बाधा नहीं बनना चाहिए। साथ ही कार्रवाई का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि निर्धारित ध्वनि सीमाओं का पालन कराना और आम लोगों को अनावश्यक शोर से राहत दिलाना होना चाहिए। जनता चाहती है कि पुलिस की यह सक्रियता केवल कुछ आयोजनों तक सीमित न रहे, बल्कि नियमों के उल्लंघन के मामलों में लगातार दिखाई दे।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद कार्रवाई, नियमों के पालन पर सबकी नजर

न्यायालय के निर्देशों का पालन और नागरिकों को राहत—दोनों महत्वपूर्ण। डीजे के मामले में हाई कोर्ट के आदेश के बाद जबलपुर पुलिस द्वारा की जा रही कार्रवाई ने ध्वनि प्रदूषण के मुद्दे को फिर से केंद्र में ला दिया है। ऐसे मामलों में संबंधित आदेशों और लागू ध्वनि प्रदूषण नियमों के अनुरूप कार्रवाई किया जाना आवश्यक है। आम जनता की अपेक्षा है कि प्रशासन स्पष्ट दिशा-निर्देशों के माध्यम से आयोजकों और डीजे संचालकों को नियमों की जानकारी दे और उल्लंघन होने पर कानून के मुताबिक कदम उठाए। इससे आयोजनों के दौरान विवाद की संभावना कम होगी और नागरिकों को भी पता रहेगा कि उनकी शिकायत पर कार्रवाई की व्यवस्था मौजूद है। इस पूरे अभियान की सफलता इस बात से तय होगी कि नियमों का पालन कितनी निरंतरता और निष्पक्षता के साथ सुनिश्चित किया जाता है।

क्या धार्मिक उत्सव बिना कानफोड़ू आवाज के नहीं मनाए जा सकते?

आस्था के लिए शोर नहीं, श्रद्धा और सहभागिता जरूरी। धार्मिक आयोजन समाज को जोड़ने, परंपराओं को जीवित रखने और लोगों में उत्साह भरने का माध्यम होते हैं। इन आयोजनों की भव्यता केवल डीजे की आवाज या साउंड सिस्टम की ताकत से तय नहीं होती। भजन, आरती, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सेवा कार्य और सामूहिक सहभागिता भी उत्सव को यादगार बनाते हैं। पहले भी लोग धार्मिक आयोजनों में पूरे उत्साह से शामिल होते थे और आज भी हो सकते हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि आयोजक अपने कार्यक्रमों की योजना बनाते समय आसपास रहने वाले नागरिकों की सुविधा का ध्यान रखें। यदि आवाज निर्धारित सीमा में रखी जाए और प्रशासन के निर्देशों का पालन हो, तो धार्मिक आस्था और नागरिकों की शांति के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।

कार्रवाई बीच में नहीं रुकनी चाहिए, जनता को स्थायी राहत की उम्मीद

कुछ दिनों की सख्ती नहीं, निरंतर निगरानी जरूरी। शहर के नागरिकों की सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि डीजे के खिलाफ शुरू हुई कार्रवाई कुछ दिनों का अभियान बनकर न रह जाए। यदि कुछ समय तक सख्ती दिखाई जाए और उसके बाद फिर पहले जैसी स्थिति लौट आए, तो समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकेगा। लोगों का कहना है कि धार्मिक आयोजनों, चल समारोहों, शादी-विवाह और दूसरे सार्वजनिक कार्यक्रमों में ध्वनि संबंधी नियमों का पालन नियमित रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जहां उल्लंघन हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई हो। साथ ही आयोजकों और डीजे संचालकों को पहले से दिशा-निर्देश दिए जाएं, ताकि नियमों की अनदेखी के कारण विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो। निरंतर निगरानी और समान कार्रवाई से ही लोगों का भरोसा मजबूत होगा।

पुलिस के साथ आयोजकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं

नियमों का पालन केवल प्रशासन का काम नहीं, सामाजिक दायित्व भी है। ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए पुलिस की कार्रवाई के साथ-साथ आयोजकों और डीजे संचालकों का सहयोग भी जरूरी है। यदि कार्यक्रम आयोजित करने वाले लोग पहले से ध्वनि की सीमा, समय और प्रशासनिक निर्देशों का ध्यान रखें, तो कई समस्याओं को शुरुआत में ही रोका जा सकता है। नागरिकों को भी शिकायत करते समय संबंधित नियमों और निर्धारित प्रक्रिया की जानकारी होनी चाहिए। प्रशासन का दायित्व है कि वह नियमों का पालन कराए, जबकि समाज का दायित्व है कि वह कानून के अनुरूप उत्सव मनाने की संस्कृति विकसित करे। इससे न केवल विवाद कम होंगे, बल्कि शहर में धार्मिक और सामाजिक आयोजनों का वातावरण भी अधिक सौहार्दपूर्ण बन सकेगा।

सवाल डीजे का नहीं, आम आदमी के अधिकारों का है

खुशी मनाने का अधिकार सबको, लेकिन शांति से जीने का अधिकार भी सबको। इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे डीजे बनाम जनता या धार्मिक आयोजन बनाम प्रशासन की लड़ाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। असल सवाल सार्वजनिक स्थानों पर ध्वनि के इस्तेमाल को नियंत्रित करने और सभी नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने का है। एक व्यक्ति को उत्सव मनाने की स्वतंत्रता है, तो दूसरे को अपने घर में आराम करने, पढ़ाई करने, काम करने और शांतिपूर्ण जीवन जीने का अधिकार भी है। कानून का उद्देश्य इन अधिकारों के बीच संतुलन बनाना है। जब नियम स्पष्ट हों और उनका पालन समान रूप से हो, तो विवाद की गुंजाइश अपने आप कम होने लगती है।

प्रथम टुडे का सवाल—आखिर आम आदमी की राहत कितनी जरूरी?

जनता की आवाज सुनना ही सुशासन की पहचान है। डीजे पर कार्रवाई को लेकर शहर में चल रही बहस एक बार फिर यह सवाल सामने लाती है कि आम नागरिकों की रोजमर्रा की परेशानियों को कितनी गंभीरता से लिया जाता है। जब लोग तेज आवाज से परेशान हों, व्यापारी अपने कामकाज में बाधा की शिकायत करें और बुजुर्ग तथा बीमार लोग शांत वातावरण की जरूरत महसूस करें, तो उनकी समस्याओं को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस की कार्रवाई से यदि लोगों को राहत महसूस हो रही है, तो इस दिशा में निरंतरता बनाए रखना जरूरी है। प्रशासन, पुलिस, आयोजकों और नागरिकों के सहयोग से ही ध्वनि प्रदूषण की समस्या पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।

त्योहारों की पहचान आस्था से हो, कानफोड़ू शोर से नहीं

जनहित में शुरू हुई कार्रवाई का उद्देश्य स्थायी राहत होना चाहिए। जबलपुर में त्योहारों और धार्मिक आयोजनों की परंपरा आगे भी बनी रहेगी। नवरात्र आएंगे, दुर्गा उत्सव मनाया जाएगा, गणेश उत्सव की रौनक लौटेगी और शहर के लोग पूरे उत्साह से इन आयोजनों में भाग लेंगे। लेकिन इन सबके बीच यह समझना जरूरी है कि उत्सव की खुशी तभी सार्थक है, जब उससे किसी दूसरे की परेशानी न बढ़े। पुलिस की कार्रवाई का स्वागत तभी सार्थक होगा, जब नियमों का पालन निरंतर हो और आम नागरिकों को वास्तविक राहत मिलती रहे।

साफ संदेश यही है—धार्मिक आस्था का सम्मान भी जरूरी है और आम आदमी की शांति का अधिकार भी। कानून के दायरे में उत्सव मनाने से किसी की खुशी कम नहीं होती, बल्कि समाज में जिम्मेदारी और सद्भाव की भावना मजबूत होती है।

प्रथम टुडे — सच की बात सबके साथ।

अनुराग दीक्षित, संपादक

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