अशोकानंद महाराज बोले—एक ओर गरबा की फूहड़ता पर सवाल, दूसरी ओर विसर्जन के नाम पर शराब और अश्लील गीतों पर चुप्पी क्यों?
जबलपुर। सनातन धर्म में देवी-देवताओं के पर्व केवल उत्सव और मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि श्रद्धा, संस्कार और धार्मिक परंपराओं से जुड़े अवसर माने जाते हैं। ऐसे में गणेश उत्सव और नवरात्रि के दौरान होने वाले आयोजनों को लेकर अब धर्म और आस्था की मर्यादा बनाए रखने पर भी चर्चा शुरू हो गई है।
प्रथम टुडे से चर्चा करते हुए अशोकानंद महाराज ने कहा कि गणेश जी और माता दुर्गा का ‘विसर्जन’ शब्द भी अपने आप में उचित नहीं माना जाना चाहिए। श्रद्धालुओं की भावना के अनुसार यह उनके प्रति विदाई और सम्मान का अवसर है। उनका कहना है कि जिस प्रकार घर में कोई पूजनीय अतिथि आता है और उसके जाने का समय भी सम्मान एवं भावुकता के साथ होता है, उसी प्रकार देवी-देवताओं की विदाई भी श्रद्धा, भक्ति और धार्मिक मर्यादा के साथ होनी चाहिए।
एक दिन की परंपरा की जगह कई दिनों तक चलता है विदाई का सिलसिला
अशोकानंद महाराज ने चर्चा के दौरान यह सवाल भी उठाया कि जब महाराष्ट्र में गणेश उत्सव की दस दिनों की परंपरा का उदाहरण दिया जाता है और बंगाल की तर्ज पर दुर्गा पूजा की बात कही जाती है, तो फिर वहां की धार्मिक परंपराओं और विदाई की व्यवस्था को भी समझने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि यदि गणेश जी और माता दुर्गा की विदाई धार्मिक रूप से निर्धारित अवसर पर होती है, तो जबलपुर में कई-कई दिनों तक अलग-अलग स्थानों पर चलने वाले विदाई कार्यक्रमों पर भी समाज और धर्मगुरुओं को विचार करना चाहिए। गणेश उत्सव के बाद कई दिनों तक चलने वाली विदाई और नवरात्रि के बाद भी कई दिनों तक जारी रहने वाली प्रक्रियाओं को लेकर उन्होंने धार्मिक मर्यादा और परंपरा पर संवाद की आवश्यकता बताई।
गणेश जी की विदाई के बाद पितृपक्ष का महत्व
अशोकानंद महाराज ने कहा कि धार्मिक दृष्टि से गणेश जी की विदाई के बाद यदि अगले दिन से पितृपक्ष प्रारंभ होता है, तो सनातन परंपरा में उसका भी विशेष महत्व है।
पितृपक्ष के दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को स्मरण करते हैं। उनके नाम से जल अर्पित किया जाता है तथा अपनी सामर्थ्य और परंपरा के अनुसार ब्राह्मण भोजन, गौ सेवा, पक्षियों एवं जरूरतमंदों को भोजन कराने जैसी धार्मिक गतिविधियां की जाती हैं।
उनका कहना है कि जिस समय पितृपक्ष प्रारंभ हो जाता है, उस समय अपने दिवंगत माता-पिता और पूर्वजों का स्मरण एवं उनके प्रति कर्तव्य निभाना प्रत्येक परिवार के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक दायित्व बन जाता है। ऐसे में धार्मिक आयोजनों की समय-सीमा और उनकी मर्यादा पर समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
विदाई के नाम पर फूहड़ गाने, शराब और नशे पर भी हो सवाल
अशोकानंद महाराज ने गणेश और दुर्गा जी की विदाई के दौरान होने वाली कथित फूहड़ता पर भी चिंता व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर धार्मिक जुलूसों और विदाई कार्यक्रमों में तेज आवाज में ऐसे गाने बजाए जाते हैं, जिनका धार्मिक आयोजन से कोई संबंध नहीं होता। इसके अलावा शराब अथवा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन कर धार्मिक जुलूसों में शामिल होना भी देखने में आता है।
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि देवी-देवताओं की विदाई के नाम पर यदि ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है, तो क्या यह सनातन धर्म की मूल भावना और धार्मिक मर्यादा के अनुरूप है?
उनका कहना है कि उत्सव मनाने और आस्था व्यक्त करने का अधिकार सभी को है, लेकिन उत्सव के नाम पर ऐसी गतिविधियां नहीं होनी चाहिए जो स्वयं उसी धार्मिक परंपरा की गरिमा को कम करें।
गरबा की फूहड़ता पर सवाल उठाने वाले विसर्जन की फूहड़ता पर भी बोलें
अशोकानंद महाराज ने धार्मिक आयोजनों को लेकर उठाए जाने वाले विरोध के तरीके पर भी सवाल खड़ा किया।
उन्होंने कहा कि जब गरबा या नवरात्रि के आयोजनों में कथित फूहड़ता को लेकर कुछ हिंदूवादी संगठन या धार्मिक संगठन विरोध करने पहुंचते हैं और आयोजकों से मर्यादा बनाए रखने की मांग करते हैं, तो उन्हीं संगठनों और धर्म के प्रति स्वयं को जिम्मेदार मानने वाले लोगों को गणेश एवं दुर्गा जी की विदाई के दौरान होने वाली फूहड़ता पर भी उसी गंभीरता से आवाज उठानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म की मर्यादा किसी एक आयोजन तक सीमित नहीं हो सकती। यदि अश्लीलता, नशा या अनुचित आचरण किसी एक धार्मिक कार्यक्रम में गलत है, तो वही मापदंड दूसरे धार्मिक आयोजनों में भी लागू होना चाहिए।
धर्मगुरु आगे आएं, जनता को समझाएं
अशोकानंद महाराज ने कहा कि इस विषय को विवाद बनाने के बजाय धर्मगुरुओं, संतों और समाज के जिम्मेदार लोगों को आगे आकर जनता को धार्मिक परंपराओं की सही जानकारी देनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि लोगों को केवल यह न बताया जाए कि क्या करना है, बल्कि यह भी समझाया जाए कि क्यों करना है और किस धार्मिक भावना के पीछे कौन-सी परंपरा है।
उनके अनुसार, यदि श्रद्धालुओं को धार्मिक आयोजनों की मर्यादा और परंपराओं की सही जानकारी दी जाए तो उत्सव अधिक अनुशासित, गरिमापूर्ण और आध्यात्मिक स्वरूप में मनाए जा सकते हैं।
आस्था रहे, उत्सव रहे लेकिन सनातन संस्कारों की मर्यादा भी बनी रहे
अशोकानंद महाराज ने कहा कि गणेश उत्सव हो, नवरात्रि हो या किसी अन्य देवी-देवता का पर्व—इनका उद्देश्य समाज को जोड़ना, भक्ति की भावना पैदा करना और सनातन संस्कारों को आगे बढ़ाना होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि उत्सव की भव्यता से अधिक महत्वपूर्ण उसकी धार्मिक मर्यादा है। डीजे, जुलूस, सजावट और मनोरंजन अपनी जगह हैं, लेकिन इनके कारण यदि पूजा और विदाई की मूल भावना पीछे छूट जाए तो समाज को इस पर आत्ममंथन करना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि सनातन परंपराओं को उनके मूल स्वरूप और गरिमा के साथ मनाने की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित करना है।
अशोकानंद महाराज ने अंत में कहा कि गणेश जी हों या माता दुर्गा—उनकी विदाई श्रद्धा, भक्ति और सम्मान के साथ होनी चाहिए। धार्मिक पर्वों में आस्था के साथ अनुशासन और मर्यादा रहे, यही सनातन परंपरा की वास्तविक भावना है।

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