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Saturday, August 8, 2026

संस्कारधाकांवड़ यात्रा

 समर्थ सद्गुरु भैयाजी सरकार (दादागुरु) के पावन सानिध्य में निकलेगी विराट यात्रा, एक लाख से अधिक कांवड़ियों के जुटने की उम्मीद



आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है यात्रा, प्रशासन ने शुरू की तैयारियां

जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर की पहचान बन चुकी ऐतिहासिक संस्कार कांवड़ यात्रा को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। एक ओर जहां आयोजक मंडल द्वारा यात्रा को भव्य और व्यवस्थित बनाने के लिए तैयारियां की जा रही हैं, वहीं प्रशासन ने भी सुरक्षा, यातायात एवं अन्य व्यवस्थाओं को लेकर अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। अपनी विशाल जनभागीदारी और अनूठी परंपराओं के चलते संस्कार कांवड़ यात्रा ने जबलपुर ही नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश और देशभर में अपनी अलग पहचान बनाई है। यात्रा का नाम गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज हो चुका है।

दादागुरु के पावन सानिध्य में होती है यात्रा

संस्कार कांवड़ यात्रा के मुख्य सूत्रधार नर्मदा मिशन के संस्थापक समर्थ सद्गुरु भैयाजी सरकार (दादागुरु) हैं। उन्हीं के पावन सानिध्य, प्रेरणा और मार्गदर्शन में प्रतिवर्ष इस विशाल कांवड़ यात्रा का आयोजन किया जाता है। नर्मदा संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और धार्मिक आस्था को एक साथ जोड़ने वाली इस यात्रा ने समय के साथ एक बड़े जनआंदोलन का स्वरूप ले लिया है।

यात्रा के जमीनी स्तर पर संचालन और व्यवस्थाओं में संस्कार कांवड़ यात्रा समिति की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। समिति से जुड़े कार्यकर्ता यात्रा मार्ग, श्रद्धालुओं की सुविधा, भंडारे, स्वागत मंच और अन्य व्यवस्थाओं को सुचारू बनाने में जुटते हैं। शिव यादव एवं निलेश रावल प्रमुख संयोजकों के रूप में यात्रा के आयोजन और संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके साथ अनेक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता और स्वयंसेवक भी व्यवस्थाओं में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं।

एक लाख से अधिक कांवड़िए करेंगे नर्मदा जल से अभिषेक

संस्कार कांवड़ यात्रा में हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। इस बार भी एक लाख से अधिक कांवड़ियों के शामिल होने की उम्मीद है। श्रद्धालु मां नर्मदा के पवित्र घाट से जल लेकर करीब 30 से 35 किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए खमरिया स्थित मटामर कैलाश धाम पहुंचते हैं। यहां भगवान शिव की पिंडी पर मां नर्मदा का पवित्र जल अर्पित किया जाता है।

यात्रा का विशाल स्वरूप ऐसा होता है कि कांवड़ियों का कारवां कई किलोमीटर तक दिखाई देता है और पूरा मार्ग भगवामय नजर आने लगता है।

एक कांवड़ में जल, दूसरी में पौधा—आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण

संस्कार कांवड़ यात्रा की सबसे विशेष परंपराओं में से एक है पौधों को कांवड़ के साथ लेकर चलना। श्रद्धालु एक कांवड़ में मां नर्मदा का जल लेकर चलते हैं, जबकि दूसरी कांवड़ में पौधा लेकर यात्रा करते हैं।

यात्रा के पश्चात इन पौधों का रोपण खमरिया की पहाड़ी एवं मटामर कैलाश धाम के आसपास के क्षेत्रों में किया जाता है। वर्षों से जारी इस परंपरा के चलते क्षेत्र में हरियाली का दायरा लगातार बढ़ा है। इस तरह यात्रा भगवान शिव की आराधना के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का भी प्रभावी संदेश देती है।

रात से ही शुरू हो जाता है भक्ति का माहौल

कांवड़िए यात्रा से एक दिन पहले ही मां नर्मदा के घाट पर पहुंचना शुरू कर देते हैं। रातभर घाट पर भजन-कीर्तन का दौर चलता है। सुबह श्रद्धालुओं के लिए साबूदाना खिचड़ी का भंडारा आयोजित किया जाता है। इसके बाद विधिवत मां नर्मदा का जल कांवड़ में लेकर यात्रा प्रारंभ की जाती है।

ग्वारीघाट से मटामर तक भगवामय होगा मार्ग

यात्रा की शुरुआत ग्वारीघाट से होती है। यहां से कांवड़िए रामपुर चौक, बंदरिया तिराहा, शास्त्री ब्रिज, तीन पत्ती चौराहा, मालवीय चौक, सुपर मार्केट, लॉर्डगंज, बड़ा फव्वारा, सराफा चौक, खटीक मोहल्ला, फूटा ताल, बेलबाग, घमापुर चौराहा, शीतला माई चौराहा, गोकलपुर और रांझी होते हुए खमरिया स्थित मटामर कैलाश धाम पहुंचते हैं।

करीब 30 से 35 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर कांवड़ियों का विशाल कारवां निकलता है। यात्रा के दौरान करीब 10 से 12 किलोमीटर तक का मार्ग भगवा रंग में रंगा हुआ नजर आता है।

जगह-जगह स्वागत मंच और भंडारे

कांवड़ियों के स्वागत के लिए पूरे यात्रा मार्ग में जगह-जगह स्वागत मंच और भंडारे लगाए जाते हैं। श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था को देखते हुए अधिकांश स्थानों पर फल एवं फलाहारी सामग्री की व्यवस्था की जाती है, क्योंकि बड़ी संख्या में कांवड़िए यात्रा के दौरान उपवास रखते हैं।

सामाजिक और धार्मिक संगठनों के साथ स्थानीय नागरिक भी कांवड़ियों की सेवा में जुटते हैं। कहीं जलपान तो कहीं फलाहार और कहीं चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

कांवड़ों में दिखाई देती है भक्ति की अद्भुत झलक

संस्कार कांवड़ यात्रा में कांवड़ भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र होती हैं। श्रद्धालु अपनी कांवड़ों को अलग-अलग धार्मिक स्वरूपों और आकर्षक सजावट से सजाते हैं। कई कांवड़ों में भोले बाबा का स्वरूप, तो कहीं राधा-कृष्ण की झांकी दिखाई देती है। विभिन्न धार्मिक स्वरूपों से सजी कांवड़ यात्रा की भव्यता को और बढ़ा देती हैं।

आस्था, सेवा और पर्यावरण का विराट संगम

संस्कार कांवड़ यात्रा आज केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह गई है, बल्कि यह आस्था, सेवा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सहभागिता का विराट संगम बन चुकी है। दादागुरु के मार्गदर्शन में आयोजित होने वाली इस यात्रा में मां नर्मदा के जल से भगवान शिव का अभिषेक करने के साथ पौधरोपण की परंपरा प्रकृति संरक्षण का संदेश देती है।

आयोजक समिति और प्रशासन की तैयारियों के बीच अब संस्कारधानी उस ऐतिहासिक क्षण की ओर बढ़ रही है, जब हजारों-लाखों कांवड़िए एक साथ ‘हर-हर महादेव’ और ‘नर्मदे हर’ के जयघोष के साथ मटामर कैलाश धाम की ओर कदम बढ़ाएंगे।

नोट: आपके दिए संदर्भ के अनुसार मैंने मुख्य सूत्रधार के रूप में दादागुरु और संचालन/व्यवस्था में शिव यादव व निलेश रावल को रखा है। साथ ही रिकॉर्ड के संबंध में पहले लिखे “लिम्का बुक” की जगह आपके नए संदर्भ के अनुसार गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स लिखा है।

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