रक्षाबंधन पर बहनों की मिठाई पर महंगाई का तड़का, 15 दिन में शक्कर के दामों में उछाल ने बढ़ाई चिंता - Pratham Today, Sach Ki Baat SabKe Saath -->

Breaking

Friday, August 21, 2026

रक्षाबंधन पर बहनों की मिठाई पर महंगाई का तड़का, 15 दिन में शक्कर के दामों में उछाल ने बढ़ाई चिंता

 45 रु. से 75 रु किलो पहुंची शक्कर, त्योहारों की बढ़ती कतार के बीच आम आदमी की जेब पर बढ़ा बोझ


रक्षाबंधन का त्योहार नजदीक है। भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को समर्पित इस पर्व को लेकर बाजारों में तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधने की तैयारी कर रही हैं तो भाई भी अपनी बहनों के लिए उपहार और मिठाई खरीदने की तैयारी में जुटे हैं। लेकिन इस बार त्योहार की खुशियों पर महंगाई का ऐसा तड़का लगता दिखाई दे रहा है, जिसने आम परिवारों की चिंता बढ़ा दी है।

सबसे ज्यादा चर्चा इस समय शक्कर के बढ़ते दामों को लेकर है। लोगों का कहना है कि महज करीब 15 दिन पहले जिस शक्कर की कीमत लगभग 45 रुपये प्रति किलो थी, वही अब बढ़कर करीब 75 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। यानी कुछ ही दिनों में कीमत में करीब 30 रुपये प्रति किलो का बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है।

त्योहार आए नहीं कि महंगाई ने दस्तक दे दी

रक्षाबंधन के बाद त्योहारों की लंबी श्रृंखला शुरू होने वाली है। हरितालिका व्रत, संतान सप्तमी और जन्माष्टमी जैसे महत्वपूर्ण पर्व आने वाले हैं। इन त्योहारों में मिठाई, प्रसाद और विभिन्न प्रकार के पकवानों की मांग बढ़ना स्वाभाविक है।

ऐसे में सवाल यह है कि यदि त्योहारों के पहले ही शक्कर के दाम इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं, तो आने वाले दिनों में बाजार की स्थिति क्या होगी? आम उपभोक्ताओं के बीच तो यहां तक चर्चा शुरू हो गई है कि शक्कर के दाम 100 रुपये प्रति किलो के पार भी जा सकते हैं।

बेशक यह आशंका फिलहाल लोगों की चिंता और बाजार की चर्चाओं पर आधारित है, लेकिन जिस तेजी से कीमतों में बदलाव देखने को मिल रहा है, उसने इस सवाल को जरूर जन्म दे दिया है कि आखिर त्योहारों के मौसम में महंगाई पर नियंत्रण कैसे होगा?

पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर भी उठ रहे सवाल

शक्कर के बढ़ते दामों के बीच अब पेट्रोल में एथेनॉल मिलाए जाने को लेकर भी लोगों के बीच चर्चा और सवाल सामने आने लगे हैं। आम लोगों का कहना है कि जब गन्ने से बनने वाले उत्पादों का एक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर जाता है और एथेनॉल को पेट्रोल में ब्लेंड किया जा रहा है, तो कहीं इसका असर शक्कर की उपलब्धता और कीमतों पर तो नहीं पड़ रहा?

दरअसल, एथेनॉल का उत्पादन गन्ने के रस, शीरे सहित अन्य कृषि स्रोतों से भी किया जाता है और इसे पेट्रोल में मिलाने की नीति के तहत इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में आम उपभोक्ता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि गन्ने की उपज का कितना हिस्सा शक्कर बनाने में जा रहा है और कितना एथेनॉल उत्पादन में?

हालांकि, केवल एथेनॉल ब्लेंडिंग को शक्कर की कीमतों में मौजूदा बढ़ोतरी का एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा। शक्कर के दामों पर उत्पादन, मांग-आपूर्ति, स्टॉक, बाजार की परिस्थितियां और सरकारी नीतियों सहित कई कारकों का असर पड़ता है। लेकिन जिस समय त्योहारों की मांग बढ़ने वाली हो और शक्कर के दाम तेजी से ऊपर जा रहे हों, उस समय इस पूरे समीकरण पर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

जनता पूछ रही—गन्ने का रस पेट्रोल में जा रहा है तो शक्कर की मिठास क्यों महंगी हो रही?

आम आदमी का सवाल सीधा है—अगर गन्ने से बनने वाले एथेनॉल का इस्तेमाल पेट्रोल में हो रहा है, तो क्या इसका शक्कर के उत्पादन और बाजार में उपलब्धता पर कोई प्रभाव पड़ रहा है?

सरकार को इस सवाल का जवाब आंकड़ों के साथ देना चाहिए। आखिर गन्ने से बनने वाले उत्पादों का कितना हिस्सा शक्कर के लिए और कितना एथेनॉल के लिए इस्तेमाल हो रहा है? क्या मौजूदा कीमतों पर इसका कोई प्रभाव पड़ा है? और यदि प्रभाव पड़ा है तो त्योहारों के मौसम में उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सरकार की क्या योजना है?

क्योंकि आम आदमी के लिए यह पूरा मामला अब केवल पेट्रोल की कीमत और शक्कर की कीमत का नहीं रह गया है। सवाल यह है कि कहीं एक तरफ पेट्रोल में एथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ाने की नीति और दूसरी तरफ घरेलू बाजार में शक्कर की बढ़ती कीमतों के बीच कोई संबंध तो नहीं है?

बहन राखी बांधेगी या महंगाई का हिसाब लगाएगी?

रक्षाबंधन केवल राखी का त्योहार नहीं है। यह भावनाओं का त्योहार है। बहन भाई के लिए मिठाई लेकर आती है, भाई बहन का मुंह मीठा कराता है और दोनों एक-दूसरे के प्रति अपने स्नेह का इजहार करते हैं।

लेकिन जब मिठाई बनाने वाली प्रमुख सामग्री ही महंगी हो जाएगी तो उसका सीधा असर मिठाइयों की कीमतों पर पड़ना स्वाभाविक है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इस बार बहनें भाई के लिए मिठाई खरीदते समय उसकी कीमत नहीं बल्कि अपना बजट देखेंगी?

एक तरफ त्योहार की खुशी और दूसरी तरफ जेब पर बढ़ता बोझ—आम परिवार इसी दोहरी चिंता के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है।

सरकार और विपक्ष की खामोशी पर भी सवाल

महंगाई का मुद्दा हमेशा राजनीति के केंद्र में रहा है। विपक्ष सरकार को महंगाई के मुद्दे पर घेरता रहा है और सरकार अपने स्तर पर कीमतों को नियंत्रित करने के प्रयासों की बात करती रही है।

लेकिन शक्कर की कीमतों में अचानक आई तेजी को लेकर आम उपभोक्ताओं के बीच यह सवाल जरूर उठ रहा है कि आखिर इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष दोनों की आवाज इतनी धीमी क्यों है?

जब रसोई से जुड़ी किसी आवश्यक वस्तु के दाम बढ़ते हैं तो उसका असर केवल एक उत्पाद तक सीमित नहीं रहता। शक्कर महंगी होने का मतलब मिठाई, बेकरी उत्पाद, चाय और घरेलू उपयोग की कई चीजों की लागत पर असर पड़ना भी है।

त्योहारों के समय मांग बढ़ने पर इसका असर बाजार की अन्य कीमतों पर भी पड़ सकता है।

लाड़ली बहना को ₹1500, लेकिन बाजार में महंगाई का बोझ?

मध्यप्रदेश सरकार की लाड़ली बहना योजना के तहत पात्र महिलाओं को हर महीने आर्थिक सहायता दी जा रही है। वर्तमान में ₹1500 मासिक सहायता का उल्लेख करते हुए सरकार महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की बात करती है।

लेकिन अब इसी को लेकर आम महिलाओं के बीच एक अलग सवाल भी सुनाई देने लगा है।

महिलाओं का कहना है—“सरकार एक हाथ से पैसा दे रही है और अगर बाजार में महंगाई उसी पैसे को दूसरे हाथ से वापस ले रही है, तो राहत कितनी बचती है?”

यह सवाल राजनीतिक आरोप से ज्यादा उस परिवार की चिंता को सामने रखता है, जिसे हर महीने घर का राशन, बच्चों की जरूरतें, बिजली-पानी के खर्च और त्योहारों की तैयारी—सब कुछ सीमित आय में करना है।

त्योहार खुशियों के लिए हैं, महंगाई का हिसाब लगाने के लिए नहीं

त्योहार भारतीय संस्कृति की पहचान हैं। रक्षाबंधन जैसे पर्व बाजार से ज्यादा रिश्तों और भावनाओं से जुड़े होते हैं। लेकिन जब रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो त्योहार का बजट भी प्रभावित होता है।

राखी खरीदने से लेकर मिठाई, फल, कपड़े और उपहार तक—हर चीज का खर्च परिवार के मासिक बजट को प्रभावित करता है। ऐसे में शक्कर जैसी बुनियादी सामग्री की कीमत में अचानक उछाल आम आदमी की परेशानी को और बढ़ा देता है।

सवाल सिर्फ शक्कर का नहीं, त्योहारों की खुशियों का है

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले त्योहारों के दौरान आम उपभोक्ता को राहत कैसे मिलेगी?

क्या प्रशासन बाजार में कीमतों की निगरानी करेगा?

क्या जमाखोरी और कालाबाजारी पर नजर रखी जाएगी?

क्या खाद्य सामग्री की कीमतों में अचानक होने वाली बढ़ोतरी की जांच होगी?

और क्या त्योहारों के मौसम में आम आदमी को उचित कीमत पर जरूरी सामान उपलब्ध कराने के लिए कोई ठोस व्यवस्था की जाएगी?

क्योंकि बात सिर्फ ₹45 से ₹75 किलो हुई शक्कर की नहीं है। बात उस परिवार की है जो पूरे साल त्योहार का इंतजार करता है और अब त्योहार आने से पहले ही अपने बजट का हिसाब लगाने को मजबूर है।

रक्षाबंधन पर बहन भाई की कलाई पर राखी बांधे, मिठाई खिलाए और खुशी मनाए—यह त्योहार की असली भावना है। ऐसा न हो कि इस बार मिठाई की मिठास से ज्यादा उसकी कीमत का स्वाद लोगों को याद रह जाए।

महंगाई पर नियंत्रण की जिम्मेदारी सरकार की है, बाजार की निगरानी प्रशासन की और जनता को जवाब मांगने का पूरा अधिकार है।

— प्रथम टुडे | सच की बात सबके साथ

No comments: