अल्ट्रा क्लीन पर रिपोर्ट तलब, अब अन्य सफाई ठेका कंपनियों की जांच की भी उठी मांग
जबलपुर | प्रथम टुडे
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) द्वारा जबलपुर नगर निगम की आउटसोर्स व्यवस्था से जुड़े मामले में रिपोर्ट तलब किए जाने के बाद अब सवाल केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रह गया है। शहर में वर्षों से सफाई कार्य कर रही अन्य ठेका कंपनियों की कार्यप्रणाली, कर्मचारियों को मिलने वाले वेतन, ईपीएफ-ईएसआई, सुरक्षा मानकों और करोड़ों रुपये के भुगतान की भी निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। जानकारों का कहना है कि यदि एक मामले में गंभीर अनियमितताओं की आशंका है, तो पूरी आउटसोर्स व्यवस्था की व्यापक समीक्षा होना आवश्यक है।
अल्ट्रा क्लीन पर मानवाधिकार आयोग का संज्ञान
सफाई एवं मैदानी कार्यों से जुड़ी अल्ट्रा क्लीन कंपनी के खिलाफ कथित श्रमिक शोषण, न्यूनतम वेतन में अनियमितता, ईपीएफ-ईएसआई का लाभ नहीं देने, सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराने और भुगतान संबंधी गड़बड़ियों की शिकायत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया है। आयोग ने क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त (भोपाल), श्रम आयुक्त, मध्यप्रदेश तथा नगर निगम आयुक्त, जबलपुर से दो सप्ताह के भीतर विस्तृत एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) मांगी है।
अब अन्य ठेका कंपनियां भी जांच के दायरे में लाने की मांग
मानवाधिकार आयोग की कार्रवाई के बाद शहर में यह मांग उठने लगी है कि जांच केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। नगर निगम में सफाई का कार्य कर रही सभी आउटसोर्स एजेंसियों के अनुबंध, कर्मचारियों के वेतन, उपस्थिति, ईपीएफ, ईएसआई और भुगतान रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच कराई जाए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
मां नर्मदा सांई सेवा समिति को लेकर भी उठ रहे सवाल
नगर निगम में सफाई कार्य कर रही मां नर्मदा सांई सेवा समिति को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगाए जाते रहे हैं कि यह संस्था पहले दूसरे नाम से कार्य कर चुकी थी और बाद में नए नाम से नगर निगम में ठेका प्राप्त किया। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित जांच और अभिलेखों से ही हो सकेगी, लेकिन इस संबंध में भी जांच की मांग उठ रही है।
नगर निगम सदन में भी गूंज चुका है मामला
नगर निगम के एक सदन की कार्यवाही के दौरान पार्षद कमलेश अग्रवाल ने भी इस कंपनी से जुड़े मुद्दे उठाए थे। उन्होंने स्वच्छता व्यवस्था और कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामलों पर सवाल खड़े किए थे। इसके बाद भी विभिन्न स्तरों पर इस विषय को लेकर चर्चाएं होती रही हैं।
पहले भी कार्रवाई होने के दावे
चर्चाओं के बीच यह भी कहा जाता रहा है कि संबंधित कंपनी पर पूर्व में जुर्माना लगाया जा चुका है। हालांकि अब यह सवाल उठ रहा है कि यदि पहले अनियमितताओं पर कार्रवाई हुई थी तो उसके बाद अनुबंधों की निगरानी और सुधारात्मक कदम कितने प्रभावी रहे।
करोड़ों के भुगतान की भी हो सकती है पड़ताल
नगर निगम द्वारा आउटसोर्स एजेंसियों को हर माह बड़ी राशि का भुगतान किया जाता है। ऐसे में जांच के दौरान यह देखा जा सकता है कि कर्मचारियों की वास्तविक संख्या क्या है, बैंक खातों में कितना भुगतान हुआ, ईपीएफ और ईएसआई का अंशदान नियमित जमा हुआ या नहीं तथा उपस्थिति और भुगतान के रिकॉर्ड में कोई अंतर तो नहीं है।
पूरी व्यवस्था की निष्पक्ष जांच की मांग
मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप के बाद अब मांग यह भी उठ रही है कि नगर निगम की पूरी आउटसोर्स व्यवस्था का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। यदि कहीं भी श्रमिकों के अधिकारों का हनन, भुगतान में अनियमितता या अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित एजेंसियों और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए।

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