समय से पहले जन्मे कम वजन के शिशु की सांसों को मिला सहारा, डॉ. विजया जायसवाल और SNCU टीम की पहल से मिली बड़ी चिकित्सीय सफलता
जबलपुर। समय से पहले जन्म लेने वाले नवजात शिशुओं को सांस लेने में होने वाली गंभीर परेशानी कई बार उनके जीवन के लिए चुनौती बन जाती है। ऐसे नाजुक हालात में समय पर सही उपचार मिलना बेहद महत्वपूर्ण होता है। जबलपुर के रानी दुर्गावती महिला चिकित्सालय (एल्गिन अस्पताल) में चिकित्सकों ने आधुनिक चिकित्सा तकनीक LISA (लेस इनवेसिव सर्फैक्टेंट एडमिनिस्ट्रेशन) का सफल प्रयोग कर गंभीर स्थिति में पहुंचे एक प्रीमैच्योर नवजात के उपचार में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। अस्पताल की स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (SNCU) में किए गए इस उपचार के दौरान नवजात को वेंटिलेटर पर रखे बिना सर्फैक्टेंट दवा देने में सफलता मिली।
सांस लेने में थी गंभीर परेशानी, समय पर उपचार बना अहम
जानकारी के अनुसार, नवजात शिशु का जन्म समय से पहले हुआ था और उसका वजन भी काफी कम था। शिशु को सांस लेने में गंभीर परेशानी थी, जिसे चिकित्सा विज्ञान में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (RDS) कहा जाता है। प्रीमैच्योर बच्चों में फेफड़ों के पूरी तरह विकसित नहीं होने के कारण यह समस्या उत्पन्न हो सकती है। ऐसे बच्चों के उपचार में विशेष सावधानी, लगातार निगरानी और समय पर उचित चिकित्सकीय हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।
एल्गिन अस्पताल की SNCU में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विजया जायसवाल ने अपनी टीम के साथ LISA तकनीक का उपयोग कर नवजात का उपचार किया। इस प्रक्रिया में शिशु को वेंटिलेटर पर रखे बिना सर्फैक्टेंट दवा फेफड़ों तक पहुंचाई गई। अस्पताल के अनुसार, यह प्रक्रिया सफल रही और गंभीर स्थिति से जूझ रहे नवजात को उपचार का लाभ मिला।
क्या है LISA तकनीक, कैसे करती है काम?
LISA यानी Less Invasive Surfactant Administration नवजात शिशुओं, विशेषकर समय से पहले जन्मे बच्चों में सांस संबंधी परेशानी के उपचार की आधुनिक विधि है। प्रीमैच्योर शिशुओं के फेफड़ों में सर्फैक्टेंट नामक पदार्थ की कमी हो सकती है। यह पदार्थ फेफड़ों को फैलाए रखने और सांस लेने की प्रक्रिया को आसान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसकी कमी होने पर बच्चे को सांस लेने में परेशानी होती है और कई मामलों में उसे अतिरिक्त श्वसन सहायता की जरूरत पड़ती है। LISA तकनीक में एक पतली कैथेटर की मदद से सर्फैक्टेंट दवा सीधे श्वासनली में पहुंचाई जाती है, जबकि प्रशिक्षित चिकित्सकीय टीम की निगरानी में शिशु को स्वयं सांस लेने दिया जाता है। इससे उपयुक्त मामलों में वेंटिलेटर की जरूरत कम करने में मदद मिल सकती है।
नाजुक फेफड़ों की सुरक्षा और उपचार में मिल सकती है मदद
नवजात शिशुओं के फेफड़े बेहद नाजुक होते हैं। ऐसे में अनावश्यक रूप से आक्रामक श्वसन सहायता से बचना चिकित्सकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है। LISA तकनीक का प्रमुख उद्देश्य उपयुक्त शिशुओं को सर्फैक्टेंट उपलब्ध कराते हुए यांत्रिक वेंटिलेशन की आवश्यकता कम करना है।
हालांकि, यह तकनीक हर नवजात के लिए उपयुक्त नहीं होती। इसका उपयोग शिशु की स्थिति, सांस लेने की क्षमता और चिकित्सकीय आकलन के आधार पर किया जाता है। जरूरत पड़ने पर वेंटिलेटर सहित अन्य जीवनरक्षक उपचार भी आवश्यक हो सकते हैं।
सरकारी अस्पताल में आधुनिक उपचार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
एल्गिन अस्पताल की SNCU में इस तकनीक का सफल प्रयोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में नवजात शिशुओं के उपचार की संभावनाओं को सामने लाता है। गंभीर स्थिति में जन्म लेने वाले बच्चों को समय पर विशेषज्ञ देखभाल और आधुनिक उपचार उपलब्ध होना उनके जीवन की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
इस सफलता पर जबलपुर जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. नवीन कोठारी, एल्गिन अस्पताल की अधीक्षक डॉ. नीता पाराशर, SNCU प्रभारी डॉ. पल्लवी लोंडे और वरिष्ठ चिकित्सकों ने डॉ. विजया जायसवाल सहित पूरी टीम की सराहना की।
डॉ. विजया जायसवाल ने बताई तकनीक की अहमियत
डॉ. विजया जायसवाल के अनुसार, SNCU में आने वाले प्रीमैच्योर बच्चों का उपचार चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे बच्चों के लिए समय पर सही उपचार और लगातार निगरानी बेहद जरूरी है। LISA जैसी तकनीक उपयुक्त मामलों में वेंटिलेटर से जुड़ी जटिलताओं को कम करने में मदद कर सकती है। सरकारी अस्पताल में इस तरह की आधुनिक उपचार पद्धति का सफल उपयोग नवजात देखभाल को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
नवजात देखभाल में तकनीक और विशेषज्ञता का मेल जरूरी
नवजात शिशु का जीवन बचाने में आधुनिक तकनीक के साथ चिकित्सकों का अनुभव, समय पर निर्णय और प्रशिक्षित चिकित्सा टीम की भूमिका भी अहम होती है। एल्गिन अस्पताल में LISA तकनीक का सफल प्रयोग इस बात को रेखांकित करता है कि गंभीर नवजातों के उपचार में उन्नत चिकित्सा पद्धतियां कितनी उपयोगी साबित हो सकती हैं। ऐसी सुविधाओं का विस्तार और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता भविष्य में भी अनेक नन्हीं जिंदगियों को बेहतर उपचार देने में सहायक हो सकती है।

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