रक्षाबंधन से दीपावली तक त्योहारों की लंबी कतार, बढ़ती शक्कर की कीमतों ने बढ़ाई आम आदमी की चिंता
प्रथम टुडे | विशेष रिपोर्ट
2013 में प्याज ने मचाई थी राजनीतिक हलचल
महंगाई जब रसोई से निकलकर सीधे त्योहारों और घर-परिवार के बजट तक पहुंचती है, तो उसका असर केवल जेब पर नहीं बल्कि जनता के मूड पर भी दिखाई देने लगता है। देश ने इसका उदाहरण वर्ष 2013 में प्याज की कीमतों के दौरान देखा था। उस समय दिल्ली में प्याज के दाम कई जगह ₹80 से ₹100 किलो तक पहुंच गए थे और बढ़ती कीमतें चुनावी मुद्दा बन गई थीं। भोपाल में भी प्याज करीब ₹100 किलो तक पहुंचने की खबरें सामने आई थीं।
दिल्ली की तत्कालीन कांग्रेस सरकार को इस मुद्दे पर भारी राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा था। यहां तक कि सरकार ने सस्ते प्याज की बिक्री के लिए मोबाइल वैन तक उतारी थीं। हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 2013 की प्याज महंगाई का सबसे प्रत्यक्ष राजनीतिक असर दिल्ली की कांग्रेस सरकार पर पड़ा था, इसे मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार गिरने का कारण बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
अब शक्कर की बढ़ती कीमतें दे रही हैं नई चिंता
आज परिस्थितियां कुछ अलग हैं, लेकिन सवाल वही है—रसोई की बढ़ती कीमतों का राजनीतिक असर कितना बड़ा हो सकता है?
देश में शक्कर की कीमतों में हाल के दिनों में तेज उछाल देखने को मिला है। रिपोर्टों के अनुसार कुछ बाजारों में कीमतों में एक महीने के भीतर करीब 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है, जबकि कुछ क्षेत्रों में दो सप्ताह में कीमतें 46 प्रतिशत तक बढ़ने की खबर सामने आई है। बढ़ती कीमतों के पीछे सीमित आपूर्ति, उत्पादन में कमी और त्योहारी मांग जैसे कारण बताए जा रहे हैं।
सरकार ने 15 दिन के स्टॉक की सीमा लगाई लेकिन असर नहीं दिख रहा
बढ़ती कीमतों और जमाखोरी पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने शक्कर के थोक उपभोक्ताओं के स्टॉक पर नई सीमा लागू करने का निर्णय लिया है। 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक, हर महीने 10 मीट्रिक टन से अधिक शक्कर इस्तेमाल करने वाले बड़े उपभोक्ताओं को केवल 15 दिनों की जरूरत के बराबर स्टॉक रखने की अनुमति होगी। इससे पहले डीलरों के लिए 30 दिन की स्टॉक सीमा लागू की गई थी।
सरकार का तर्क है कि इस कदम से जमाखोरी, कृत्रिम कमी और सट्टेबाजी पर लगाम लगेगी तथा बाजार में शक्कर की उपलब्धता बनी रहेगी। लेकिन आम उपभोक्ता का सवाल यह है कि अगर कीमतें लगातार बढ़ रही हैं तो सिर्फ स्टॉक सीमा लगाने से राहत आखिर कब और कितनी मिलेगी?
त्योहार सामने… मिठाई की मिठास पर महंगाई का असर
इस समय सबसे बड़ी चिंता आने वाले त्योहारों को लेकर है। रक्षाबंधन सामने है। भाई-बहन के इस त्योहार में मिठाई का विशेष महत्व है। अगर शक्कर महंगी होती है तो उसका सीधा असर मिठाई की लागत पर पड़ेगा और स्वाभाविक रूप से मिठाई के दाम भी बढ़ सकते हैं।
इसके बाद जन्माष्टमी, हरितालिका तीज, गणेश चतुर्थी, दशहरा और दीपावली जैसे लगातार आने वाले त्योहार हैं। गणेश उत्सव में भगवान गणेश को लगाए जाने वाले मोदक से लेकर दीपावली की मिठाइयों तक शक्कर की खपत बड़े पैमाने पर होती है।
यानी आने वाले महीनों में अगर शक्कर के दाम नियंत्रित नहीं हुए तो इसका असर केवल चाय में पड़ने वाली एक चम्मच शक्कर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मिठाई, मोदक, बेकरी उत्पाद और कई दूसरे खाद्य पदार्थ भी महंगे हो सकते हैं।
मिठाई कारोबारी भी बढ़ती लागत से परेशान
शक्कर की बढ़ती कीमत का असर मिठाई कारोबार पर पहले ही दिखाई देने लगा है। मिठाई बनाने वालों की उत्पादन लागत बढ़ रही है और कारोबारी मान रहे हैं कि यदि शक्कर के दाम इसी तरह बढ़ते रहे तो उन्हें मिठाइयों के दाम बढ़ाने पड़ सकते हैं।
इसका सीधा मतलब है कि इस बार रक्षाबंधन पर भाई की कलाई पर राखी बांधने के बाद बहन को भाई को मिठाई खिलाने के लिए पहले से ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ सकती है।
महंगाई बनाम लाड़ली बहना… महिलाओं का सवाल
प्रथम टुडे ने जब इस मुद्दे पर महिलाओं से बातचीत की तो उनकी चिंता केवल शक्कर के दाम तक सीमित नहीं थी। महिलाओं का कहना था कि सरकार योजनाओं के माध्यम से आर्थिक सहायता देती है, लेकिन अगर दूसरी ओर रोजमर्रा की जरूरतों और त्योहारों की वस्तुएं लगातार महंगी होती जाएं तो परिवार का बजट फिर भी बिगड़ जाता है।
महिलाओं ने कहा
“हमें सरकार के 1500 रुपये लाड़ली बहना के नहीं चाहिए, लेकिन कम से कम हमारे त्योहार तो मत छीनिए। हमारे त्योहारों को फीका मत कीजिए।”
यह बयान भले ही भावनात्मक हो, लेकिन इसके पीछे महंगाई से जूझते परिवारों की वास्तविक चिंता दिखाई देती है।
सवाल सरकार से… सिर्फ स्टॉक सीमा काफी है क्या?
सरकार ने शक्कर की उपलब्धता और जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक सीमा जैसे कदम उठाए हैं। साथ ही सरकार ने कीमतों पर नियंत्रण के लिए 10 लाख टन कच्ची शक्कर के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देने का निर्णय भी लिया है, ताकि घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाई जा सके।
लेकिन सवाल यह है कि इन उपायों का फायदा आम उपभोक्ता तक कितनी जल्दी पहुंचेगा?
क्योंकि आम आदमी के लिए सरकारी नीति का मूल्यांकन कागज पर नहीं, बाजार में मिलने वाली कीमत से होता है।
शक्कर की मिठास कहीं राजनीतिक कड़वाहट में न बदल जाए
महंगाई का इतिहास बताता है कि रसोई से जुड़े सामान कई बार राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा बन जाते हैं। प्याज इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। वर्ष 2013 में प्याज की कीमतों ने सरकारों की चिंता बढ़ा दी थी और चुनावी माहौल में यह बड़ा मुद्दा बन गया था।
आज वही सवाल शक्कर को लेकर खड़ा होता दिखाई दे रहा है।
रक्षाबंधन से शुरू होकर दीपावली तक त्योहारों की लंबी श्रृंखला है। ऐसे में यदि शक्कर के दाम लगातार ऊपर जाते रहे और मिठाई की कीमतें भी बढ़ीं तो इसका असर निश्चित रूप से परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ेगा।
और राजनीति में अक्सर बड़े मुद्दे किसी बड़ी घोषणा से नहीं, बल्कि रसोई की छोटी-छोटी परेशानियों से पैदा होते हैं।
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि शक्कर कितनी महंगी हुई?
सवाल यह भी है कि क्या सरकार समय रहते इसकी कीमतों पर लगाम लगा पाएगी?
क्योंकि त्योहारों में जनता को मिठास चाहिए…
महंगाई की कड़वाहट नहीं।
‘चाय पे चर्चा’ से अब ‘फीकी चाय’ तक… सवाल सरकार से
नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर में चाय का जिक्र कोई सामान्य बात नहीं रहा है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले ‘चाय पे चर्चा’ अभियान के जरिए चाय की दुकानों को राजनीतिक संवाद के मंच के रूप में इस्तेमाल किया गया था। देश के अलग-अलग हिस्सों में चाय स्टॉल पर लोगों को जोड़कर नरेंद्र मोदी से संवाद कराया गया था और यह अभियान करीब 1,000 चाय स्टॉल तथा 300 शहरों तक पहुंचा था।
आज जब शक्कर का भाव जबलपुर में ₹80 किलो तक पहुंचने की बात सामने आ रही है और आने वाले त्योहारों में मिठाई से लेकर चाय तक हर जगह इसका असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है, तो यही चाय एक अलग राजनीतिक प्रतीक बनती दिखाई दे रही है।
कभी चुनावी दौर में ‘चाय पे चर्चा’ के जरिए जनता से संवाद का संदेश दिया गया था। अब सवाल यह है कि अगर चाय में डालने वाली शक्कर ही लगातार महंगी होती गई तो आम आदमी के घर की चाय कितनी मीठी रह पाएगी?
चाय वही रहेगी, कप वही रहेगा… लेकिन शक्कर महंगी होने से कहीं उसकी मिठास फीकी न पड़ जाए।
और यही बात महज चाय तक सीमित नहीं है। रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, हरितालिका तीज, गणेश उत्सव, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहार सामने हैं। ऐसे समय में शक्कर की कीमतों का असर सीधे आम परिवार की रसोई और त्योहारों के बजट पर पड़ना स्वाभाविक है।
यही वजह है कि ‘चाय पे चर्चा’ की राजनीति में अब ‘फीकी चाय’ का सवाल भी चर्चा का विषय बन सकता है। सरकार के सामने चुनौती केवल शक्कर की कीमत नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि त्योहारों के मौसम में आम आदमी की थाली, मिठाई की प्लेट और चाय का प्याला—तीनों महंगाई के बोझ से फीके न पड़ें।
‘चाय’ से निकला सवाल… मिठास किसके हिस्से?
बेशक सरकार स्टॉक सीमा, आयात और आपूर्ति बढ़ाने जैसे कदम उठा रही है, लेकिन आम उपभोक्ता के लिए सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि इन फैसलों का असर बाजार में कब दिखाई देगा।
क्योंकि राजनीति में प्रतीक भी मायने रखते हैं और चाय का प्याला ऐसा ही एक प्रतीक रहा है।
इसलिए सवाल यह नहीं कि चाय मीठी होगी या फीकी।
सवाल यह है कि बढ़ती शक्कर की कीमतों के बीच आम आदमी के हिस्से में त्योहारों की मिठास बचेगी भी या नहीं?
और अगर त्योहारों की मिठास महंगाई की वजह से कम हुई, तो आने वाले दिनों में ‘चाय पे चर्चा’ के साथ ‘फीकी चाय’ पर चर्चा होना भी स्वाभाविक है।
प्रथम टुडे का सवाल
क्या सरकार शक्कर की बढ़ती कीमतों को सिर्फ स्टॉक सीमा और आयात के जरिए नियंत्रित कर पाएगी, या त्योहारों से पहले आम आदमी को वास्तविक राहत देने के लिए कोई ठोस कदम उठाना होगा?
कहीं ऐसा न हो कि मिठाई की कीमत बढ़ते-बढ़ते जनता की नाराजगी भी बढ़ा दे और आने वाले समय में यही महंगाई सरकार के लिए राजनीतिक चिंता का विषय बन जाए।

No comments:
Post a Comment