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Thursday, June 4, 2026

दिल्ली में 21 मौतें, बिहार में अस्पताल में आग... क्या जबलपुर प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?


 

जबलपुर /दिल्ली के होटल अग्निकांड में 21 लोगों की मौत और बिहार के अस्पताल में हुई आगजनी की घटना ने एक बार फिर भवन सुरक्षा, फायर सेफ्टी और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जबलपुर में भी ऐसे ही हालात पनप रहे हैं? शहर की संकरी गलियों, आवासीय इलाकों और बहुमंजिला इमारतों में संचालित हो रहे होटल एवं अस्पतालों को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब अभी तक किसी के पास नहीं है।

दिल्ली और बिहार के हादसों ने दी चेतावनी

दिल्ली के होटल अग्निकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया। आग लगने के बाद लोगों को जान बचाने के लिए खिड़कियों और छतों का सहारा लेना पड़ा। वहीं बिहार के एक निजी अस्पताल में लगी आग ने भी यह साबित कर दिया कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी किसी भी समय बड़ी त्रासदी का रूप ले सकती है। सवाल यह है कि क्या जबलपुर प्रशासन इन घटनाओं से कोई सबक लेगा या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही फाइलें खुलेंगी?

यादव कॉलोनी का चर्चित होटल फिर सवालों के घेरे में

शहर की यादव कॉलोनी स्थित एक बहुमंजिला होटल इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोगों का दावा है कि होटल के सामने और आसपास की सड़कें बेहद संकरी हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर इतनी बड़ी इमारत के निर्माण की अनुमति किन आधारों पर दी गई?

यदि भवन पूरी तरह वैध है तो नगर निगम, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग और नक्शा विभाग यह स्पष्ट करें कि भवन निर्माण की स्वीकृति देते समय सड़क की चौड़ाई, पार्किंग, फायर ब्रिगेड की पहुंच और आपदा प्रबंधन के मानकों का परीक्षण किया गया था या नहीं?

पांच मंजिला इमारत का नक्शा कैसे हुआ पास?

स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि संबंधित भवन के सामने लगभग 8 फुट और एक ओर करीब 10 फुट चौड़ा मार्ग है। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि सड़क की चौड़ाई सीमित है तो फिर पांच मंजिला भवन निर्माण की अनुमति कैसे मिल गई?

क्या नगर निगम और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के पास इस संबंध में कोई विशेष अनुमति या तकनीकी आधार मौजूद है? क्या नक्शा विभाग ने सभी नियमों की जांच के बाद स्वीकृति दी थी? यदि हां, तो इसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? और यदि नहीं, तो फिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

फायर सेफ्टी के इंतजाम हैं या सिर्फ भरोसा?

दिल्ली के होटल अग्निकांड के बाद यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि शहर के ऐसे बहुमंजिला होटलों में आग लगने की स्थिति में लोगों को सुरक्षित निकालने की क्या व्यवस्था है? क्या वहां पर्याप्त फायर फाइटिंग सिस्टम, इमरजेंसी एग्जिट, वाटर लाइन और अन्य सुरक्षा संसाधन मौजूद हैं?

यदि हैं, तो उनका नियमित निरीक्षण कब हुआ था? और यदि नहीं हैं, तो क्या प्रशासन ने कभी इसकी जांच की?

तिलवारा घाट से यादव कॉलोनी तक उठ रहे सवाल

इसी होटल समूह का नाम तिलवारा घाट क्षेत्र में संचालित एक अन्य होटल को लेकर भी सामने आ चुका है, जहां सरकारी भूमि के उपयोग को लेकर शिकायतों के बाद जांच चल रही है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या प्रशासन केवल शिकायत मिलने पर ही सक्रिय होगा या फिर शहर के सभी होटलों और व्यावसायिक भवनों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट भी कराया जाएगा?

संकरी गलियों में बढ़ता होटल कारोबार

शहर के कई आवासीय क्षेत्रों और कॉलोनियों में होटल, लॉज और गेस्ट हाउस तेजी से संचालित हो रहे हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कई स्थानों पर फायर ब्रिगेड वाहन तक आसानी से नहीं पहुंच सकते। इसके बावजूद होटल कारोबार लगातार बढ़ रहा है और जिम्मेदार विभागों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है।

कटनी रोड बाईपास पर भी खड़े हो रहे बहुमंजिला होटल

नगर निगम सीमा से बाहर कटनी रोड बाईपास और आसपास के क्षेत्रों में भी तेजी से बहुमंजिला भवन खड़े होकर होटल व्यवसाय में तब्दील हो रहे हैं। लेकिन इन भवनों को किस विभाग ने अनुमति दी, क्या फायर सुरक्षा मानकों का पालन हुआ और क्या कभी इनका निरीक्षण किया गया, इसका स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आता।

अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था भी जांच के दायरे में आए

कुछ वर्ष पहले दमोहनाका क्षेत्र के एक नर्सिंग होम में आग लगने के बाद प्रशासन ने बड़े स्तर पर कार्रवाई का दावा किया था। लेकिन समय के साथ वह सख्ती ठंडी पड़ती दिखाई दी। राइट टाउन, नेपियर टाउन, धनवंतरी नगर, उखरी और अन्य क्षेत्रों में बहुमंजिला भवनों में संचालित अस्पतालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

सवाल यह है कि इन अस्पतालों का अंतिम सुरक्षा निरीक्षण कब हुआ था? क्या इनके पास वैध फायर एनओसी है? क्या मरीजों को सुरक्षित निकालने की पर्याप्त व्यवस्था मौजूद है?

प्रशासन जवाब दे, हादसे का इंतजार क्यों?

दिल्ली में 21 लोगों की मौत और बिहार के अस्पताल में हुई जनहानि एक चेतावनी है। जबलपुर में भी होटल, अस्पताल, गेस्ट हाउस और व्यावसायिक भवनों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अनेक प्रश्न उठ रहे हैं।

क्या नगर निगम, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग, फायर विभाग और जिला प्रशासन शहर के ऐसे भवनों की सूची सार्वजनिक करेंगे?

क्या पांच मंजिला इमारतों को मिली अनुमति की समीक्षा होगी?

क्या सुरक्षा मानकों की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?

या फिर प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद वही पुरानी कार्रवाई और जांच की औपचारिकता निभाएगा?

प्रथम टुडे का सवाल

"यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है तो संबंधित होटलों और अस्पतालों की स्वीकृतियां, फायर एनओसी और सुरक्षा ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जातीं?"

"और यदि कहीं खामियां हैं, तो कार्रवाई हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले क्यों नहीं?"

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