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Monday, June 22, 2026

करोड़ों का कारोबार, हजारों ग्राहकों का भरोसा... फिर भी सवालों के घेरे में घंटाघर का इंडियन कॉफी हाउस

 


जबलपुर। शहर के घंटाघर स्थित वर्षों पुराने और प्रतिष्ठित इंडियन कॉफी हाउस को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस बार मामला सिर्फ खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि पारदर्शिता, खाद्य सुरक्षा मानकों के पालन और स्थानीय युवाओं को रोजगार देने जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के अध्यक्ष डॉ. पी.जी. नाजपांडे ने कलेक्टर जबलपुर को शिकायत सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।

बासी भोजन परोसने के आरोप, जांच की मांग

शिकायत में कहा गया है कि हाल के दिनों में कुछ अधिवक्ताओं और ग्राहकों ने कॉफी हाउस में परोसे जा रहे डोसा, इडली, वड़ा और अन्य खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर गंभीर आपत्ति जताई है। आरोप है कि ग्राहकों को ताजा भोजन के बजाय बासी या खराब खाद्य सामग्री परोसी जा रही है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि तत्काल संबंधित विभाग से शिकायत करने का प्रयास किया गया, लेकिन कार्यालय बंद होने के कारण उसी समय कार्रवाई नहीं हो सकी।

करोड़ों का कारोबार, लेकिन गुणवत्ता पर सवाल क्यों?

शहर के सबसे व्यस्त भोजनालयों में शामिल यह प्रतिष्ठान प्रतिदिन हजारों ग्राहकों की मेजबानी करता है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि यहां खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा नियमित सैंपलिंग और जांच कितनी बार की गई। शिकायतकर्ताओं ने पिछले पांच वर्षों में लिए गए खाद्य नमूनों और उनकी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है ताकि उपभोक्ताओं के बीच स्थिति स्पष्ट हो सके।

खाद्य सुरक्षा कानून के पालन की मांग

शिकायत में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 तथा संबंधित नियमों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि शहर के सभी प्रमुख कॉफी हाउसों से तत्काल खाद्य पदार्थों के नमूने लेकर उनकी प्रयोगशाला जांच कराई जाए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

सबसे बड़ा सवाल—जहां वकील और पुलिस का भरोसा, वहीं विवाद क्यों?

घंटाघर स्थित इंडियन कॉफी हाउस वर्षों से शहर के अधिवक्ताओं, पुलिस अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों, व्यापारियों और बुद्धिजीवियों की पसंदीदा बैठकों का केंद्र माना जाता रहा है। दिनभर यहां बड़ी संख्या में वकील और पुलिस विभाग के अधिकारी चाय, कॉफी और नाश्ते के लिए पहुंचते हैं।

इतना ही नहीं, पुलिस कंट्रोल रूम सहित कई सरकारी बैठकों में चाय, कॉफी और नाश्ते की व्यवस्था भी अक्सर इसी प्रतिष्ठान से कराई जाती रही है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से इस संस्थान से गुणवत्ता और स्वच्छता के सर्वोच्च मानकों की अपेक्षा की जाती है।

यही कारण है कि अब शहर में यह सवाल और तेज हो गया है कि जब इतने प्रभावशाली और जिम्मेदार वर्ग का इस प्रतिष्ठान पर भरोसा है, तब फिर इसकी खाद्य गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर शिकायतें और विवाद क्यों सामने आते हैं? यदि लगाए गए आरोप गलत हैं तो जांच उन्हें खारिज करेगी, और यदि शिकायतों में तथ्य हैं तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई होना भी उतना ही आवश्यक है।

राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र

घंटाघर स्थित इंडियन कॉफी हाउस केवल भोजन और कॉफी तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों से शहर की राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, अधिवक्ताओं और नागरिक मंचों की प्रेस कॉन्फ्रेंस, बैठकें और महत्वपूर्ण चर्चाएं अक्सर इसी परिसर में आयोजित होती रही हैं।

यही वजह है कि इस प्रतिष्ठान की पहचान केवल एक रेस्तरां की नहीं, बल्कि शहर के सार्वजनिक विमर्श के महत्वपूर्ण मंच के रूप में भी है। ऐसे प्रतिष्ठान की खाद्य गुणवत्ता, स्वच्छता और कार्यप्रणाली को लेकर जब शिकायतें सामने आती हैं तो स्वाभाविक रूप से मामला आम उपभोक्ता से आगे बढ़कर व्यापक जनहित का विषय बन जाता है। ऐसे में निष्पक्ष जांच और तथ्य सार्वजनिक होना आवश्यक माना जा रहा है, ताकि लोगों का भरोसा बना रहे और यदि कहीं कोई कमी है तो उसका समय रहते निराकरण हो सके।

रोजगार नीति पर भी उठे सवाल

कॉफी हाउस की रोजगार व्यवस्था भी चर्चा का विषय बनी हुई है। कुछ सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि जबलपुर से करोड़ों रुपये का कारोबार करने वाले इस प्रतिष्ठान में स्थानीय युवाओं को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दी जाती। आरोप है कि कई पदों पर बाहरी राज्यों के कर्मचारियों की नियुक्ति अधिक है, जबकि शहर के बेरोजगार युवाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी भी बड़े प्रतिष्ठान की सामाजिक जिम्मेदारी केवल व्यापार तक सीमित नहीं होती, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना भी उसका दायित्व माना जाता है। उन्होंने भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की मांग भी की है।

15 दिन का अल्टीमेटम

नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच ने प्रशासन को 15 दिन का समय देते हुए चेतावनी दी है कि यदि इस अवधि में जांच और आवश्यक कार्रवाई नहीं हुई तो मामला न्यायालय तक ले जाया जाएगा।

अब प्रशासन के सामने ये बड़े सवाल

क्या खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर लगाए गए आरोप सही हैं?

पिछले पांच वर्षों में इंडियन कॉफी हाउस की कितनी बार खाद्य जांच हुई?

जांच रिपोर्टें सार्वजनिक क्यों नहीं हैं?

यदि पहले भी शिकायतें मिली थीं तो उन पर क्या कार्रवाई हुई?

करोड़ों रुपये का कारोबार करने वाले इस प्रतिष्ठान में गुणवत्ता नियंत्रण की निगरानी कितनी प्रभावी है?

स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की नीति क्या है?

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