दिल्ली-बिहार के हादसों से भी नहीं लिया सबक? जबलपुर के होटल, अस्पताल और हाईराइज इमारतों की सुरक्षा पर बड़े सवाल" - Pratham Today, Sach Ki Baat SabKe Saath -->

Breaking

Friday, June 5, 2026

दिल्ली-बिहार के हादसों से भी नहीं लिया सबक? जबलपुर के होटल, अस्पताल और हाईराइज इमारतों की सुरक्षा पर बड़े सवाल"

 


जबलपुर के होटल, अस्पताल और हाईराइज इमारतों की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल

जबलपुर

दिल्ली में हालिया अग्निकांड और बिहार के मुजफ्फरपुर में अस्पताल में लगी आग ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि सुरक्षा मानकों में थोड़ी सी लापरवाही भी बड़ी जनहानि का कारण बन सकती है। इन घटनाओं के बाद जबलपुर में भी होटलों, अस्पतालों और बहुमंजिला इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं। शहरवासियों का कहना है कि आखिर जिला प्रशासन, नगर निगम और फायर विभाग ने अब तक कितने होटलों, अस्पतालों और हाईराइज भवनों की जांच की है, इसकी कोई सार्वजनिक जानकारी सामने क्यों नहीं आई?

हादसे के बाद ही क्यों जागता है प्रशासन?

हर बड़ी दुर्घटना के बाद सुरक्षा जांच, बैठकें और कार्रवाई की घोषणाएं होती हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। दिल्ली और बिहार की घटनाओं के बाद भी जबलपुर में अब तक किसी व्यापक जांच अभियान की सार्वजनिक रिपोर्ट सामने नहीं आई है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?

एक ही रास्ते वाले होटल, आग लगने पर कैसे बचेगी जान?

शहर के कई होटल ऐसे क्षेत्रों में संचालित हो रहे हैं जहां प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही रास्ता है। आपातकालीन स्थिति में लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए फायर एग्जिट जैसी व्यवस्थाएं दिखाई नहीं देतीं। विशेषज्ञों का मानना है कि आग लगने की स्थिति में दूसरा निकासी मार्ग जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकता है।

कॉलोनियों में चल रहे होटल, जांच कौन करेगा?

जबलपुर की कई आवासीय कॉलोनियों में मकानों को व्यावसायिक उपयोग में बदलकर होटल संचालित किए जा रहे हैं। क्या इन सभी के पास वैध अनुमति, फायर एनओसी और अन्य आवश्यक स्वीकृतियां हैं? यदि नहीं, तो जिम्मेदार विभागों द्वारा कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही? यह सवाल लगातार उठ रहा है।

रसूख के दम पर चल रहे अस्पताल और होटल?

शहर में ऐसे अस्पतालों और होटलों को लेकर भी चर्चा होती रही है जिनके संचालन को लेकर समय-समय पर सवाल उठते हैं। आमजन के बीच यह धारणा बन रही है कि प्रभावशाली लोगों के कारण कई मामलों में नियमों के पालन की जांच अपेक्षित कठोरता से नहीं हो पाती। यदि ऐसा है तो यह सीधे जनता की सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

सराफा और मुकदमगंज जैसे क्षेत्रों में कितना सुरक्षित हैं होटल?

सराफा जैसे भीड़भाड़ वाले बाजार क्षेत्र में संचालित होटलों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। संकरी सड़कें, दिनभर का ट्रैफिक दबाव और पार्किंग की समस्या किसी भी आपदा की स्थिति में राहत और बचाव कार्य को प्रभावित कर सकती है।

मुकदमगंज क्षेत्र में भी थोक व्यापार के कारण अधिकांश समय जाम की स्थिति बनी रहती है। ऐसे में यदि किसी होटल या व्यावसायिक भवन में आग लगती है तो क्या अग्निशमन वाहन समय पर वहां पहुंच पाएंगे?

केवल छोटे अग्निशामक यंत्रों के भरोसे सुरक्षा?

कई छोटे और मध्यम श्रेणी के होटलों में सुरक्षा व्यवस्था केवल कुछ अग्निशामक यंत्रों तक सीमित दिखाई देती है। आधुनिक फायर अलार्म सिस्टम, स्मोक डिटेक्टर, स्प्रिंकलर सिस्टम और आपातकालीन निकासी व्यवस्था जैसे सुरक्षा उपकरणों की स्थिति क्या है, इसकी नियमित जांच कौन कर रहा है?

बड़े होटलों में अत्याधुनिक अग्निशमन व्यवस्था जरूर लगी है, लेकिन क्या उनकी समय-समय पर टेस्टिंग और निरीक्षण हो रहा है? यह भी महत्वपूर्ण सवाल है।

होटल और अस्पतालों के बाहर क्यों नहीं लगती सुरक्षा जांच की जानकारी?

जिस प्रकार खाद्य प्रतिष्ठानों में लाइसेंस और अन्य जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाती है, उसी प्रकार होटलों और अस्पतालों के बाहर फायर सेफ्टी निरीक्षण की तिथि, वैधता अवधि और प्रमाणपत्र भी प्रदर्शित किए जाने चाहिए। इससे लोगों को यह जानने का अधिकार मिलेगा कि जिस भवन में वे ठहर रहे हैं या इलाज करा रहे हैं, वह सुरक्षा मानकों पर खरा उतरता है या नहीं।

14 मंजिला इमारतें बन गईं, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत?

जबलपुर में पिछले कुछ वर्षों में बहुमंजिला इमारतों और हाईराइज अपार्टमेंट्स का तेजी से विस्तार हुआ है। शहर में 10, 12 और 14 मंजिल तक के भवनों में सैकड़ों परिवार रह रहे हैं। लेकिन क्या इन इमारतों में फायर सेफ्टी के सभी मानकों का पालन हो रहा है?

क्या फायर विभाग द्वारा इन भवनों का नियमित निरीक्षण किया जाता है? जिन भवनों को फायर एनओसी के आधार पर अनुमति मिली थी, क्या उनकी सुरक्षा व्यवस्थाओं की समय-समय पर समीक्षा भी होती है? यदि किसी हाईराइज इमारत में आग लगती है तो ऊपरी मंजिलों पर रहने वाले लोगों को सुरक्षित निकालने की क्या व्यवस्था है?

जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दल भी सवालों के घेरे में

शहर में फायर सेफ्टी, अवैध होटल, भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और हाईराइज इमारतों की सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर राजनीतिक दलों की चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। छोटी-छोटी बातों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस और विरोध प्रदर्शन करने वाले दल अब तक इस जनसुरक्षा के मुद्दे पर मुखर नजर नहीं आए हैं।

लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी खामोशी क्यों है? क्या प्रभावशाली लोगों और व्यावसायिक हितों के कारण राजनीतिक दल इस विषय से दूरी बनाए हुए हैं, या फिर यह मुद्दा उनकी प्राथमिकताओं में शामिल ही नहीं है? आमजन का कहना है कि यदि राजनीतिक दल वास्तव में जनता के हितैषी हैं तो किसी बड़ी दुर्घटना के बाद आंदोलन करने के बजाय उन्हें पहले से ही सड़क पर उतरकर प्रशासन से व्यापक सुरक्षा जांच और कार्रवाई की मांग करनी चाहिए।

हादसे के बाद बयानबाजी और प्रदर्शन करना आसान है, लेकिन जनहित का वास्तविक दायित्व तो तब निभाया जाएगा जब संभावित खतरों को समय रहते उजागर कर उन्हें दूर करने का दबाव बनाया जाए।

यह पैराग्राफ आपकी खबर को और धार देगा, क्योंकि इससे प्रशासन के साथ-साथ राजनीतिक दलों की जवाबदेही का सवाल भी खड़ा होगा, लेकिन बिना किसी पर सीधे आरोप लगाए।

जनता जानना चाहती है जवाब

दिल्ली और बिहार की घटनाओं ने देश को झकझोर दिया है। ऐसे में जबलपुर की जनता यह जानना चाहती है कि शहर में संचालित होटलों, अस्पतालों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और हाईराइज इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति क्या है? कितने भवनों की जांच हुई, कितनों में कमियां मिलीं और उन पर क्या कार्रवाई की गई?

क्योंकि हादसे के बाद कार्रवाई करने से बेहतर है कि समय रहते सुरक्षा व्यवस्था की निष्पक्ष जांच कर लोगों की जान बचाई जाए। आखिर सवाल सिर्फ नियमों का नहीं, हजारों नागरिकों की सुरक्षा का है।


No comments:

Post a Comment