22 मई 1997… यह तारीख आज भी जबलपुर वासियों के ज़हन में एक डरावनी याद की तरह दर्ज है। सुबह के लगभग 4 बजकर 22 मिनट का समय था। अधिकांश लोग गहरी नींद में थे। तभी अचानक धरती ने ऐसी करवट ली कि लोगों को लगा मानो सैकड़ों रेलगाड़ियां एक साथ जमीन के नीचे से गुजर रही हों। कुछ ही सेकंड में पूरा शहर दहशत में आ गया। लोग घरों से निकलकर सड़कों पर आ गए, बच्चों की चीखें, महिलाओं की घबराहट और हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
यह वही भयावह भूकंप था जिसने जबलपुर सहित पूरे महाकौशल क्षेत्र को हिला दिया था। रिक्टर स्केल पर इसकी तीव्रता लगभग 5.8 मापी गई थी और इसका केंद्र जबलपुर के पास कोसमघाट क्षेत्र माना गया।
कई मकानों में आईं दरारें, हजारों लोग रातभर रहे बाहर
भूकंप के तेज झटकों से शहर के कई इलाकों में मकानों की दीवारें फट गईं। पुराने भवनों में दरारें पड़ गईं और कई कच्चे मकान धराशायी हो गए। लोग इतने भयभीत थे कि घंटों तक अपने घरों में वापस जाने की हिम्मत नहीं जुटा सके। कई परिवारों ने पूरी रात सड़कों, मैदानों और खुले स्थानों पर बिताई।
उस दौर में मोबाइल और सोशल मीडिया जैसी सुविधाएं नहीं थीं। लोग एक-दूसरे से जानकारी लेकर हालात समझने की कोशिश कर रहे थे। जिनके परिजन दूसरे इलाकों में थे, वे उनकी कुशलता जानने के लिए परेशान थे।
जबलपुर बना था देशभर की सुर्खियां
उस समय यह भूकंप राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी खबर बना था। जबलपुर, मंडला, सिवनी और छिंदवाड़ा जिलों में इसका असर देखा गया। कई गांव प्रभावित हुए और हजारों मकान क्षतिग्रस्त हुए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार दर्जनों लोगों की मौत हुई और सैकड़ों घायल हुए थे।
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय परिसर, रेलवे के कई मकान और शहर के कुछ बड़े ढांचे भी प्रभावित हुए थे। कई स्थानों पर जमीन में दरारें तक दिखाई दी थीं।
नर्मदा फॉल्ट लाइन से जुड़ा था यह भूकंप
विशेषज्ञों के अनुसार यह भूकंप नर्मदा-सोन फॉल्ट लाइन में भूगर्भीय हलचल के कारण आया था। वैज्ञानिकों ने इसे मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण भूकंपों में शामिल माना, क्योंकि यह घटना इस बात का संकेत थी कि मध्य प्रदेश का यह क्षेत्र भी भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील है।
आज भी लोगों के मन में ताजा है वह डर
29 साल बाद भी उस सुबह को याद कर जबलपुर के बुजुर्ग और उस दौर के लोग सिहर उठते हैं। कई लोग बताते हैं कि पहली बार उन्हें महसूस हुआ था कि प्रकृति के सामने इंसान कितना बेबस है। कुछ सेकंड के झटकों ने पूरे शहर की जिंदगी रोक दी थी।
आज नई पीढ़ी शायद उस भयावह अनुभव से अनजान हो, लेकिन 22 मई 1997 की वह सुबह जबलपुर के इतिहास में हमेशा एक चेतावनी और सीख बनकर दर्ज रहेगी — कि प्रकृति जब करवट लेती है, तो इंसानी ताकत छोटी पड़ जाती है।

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