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Friday, April 3, 2026

अब्दुल रज्जाक केस में पुलिस की जांच पर हाईकोर्ट सख्त, रिकॉर्ड में हेरफेर और गलत बयानों पर फटकार


विदेश में होने के दौरान भी अपराध दर्शाया, एक साल तक गलत बेंच में सुनवाई; अब चीफ जस्टिस बेंच में होगी अगली सुनवाई


 जबलपुर | प्रथम टुडे | सच की बात सबके साथ

जबलपुर के हिस्ट्रीशीटर अब्दुल रज्जाक से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सुनवाई के दौरान सामने आई जांच की खामियों, विरोधाभासी बयानों और रिकॉर्ड में हेरफेर ने पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

कोर्ट ने माना कि केस डायरी और रोजनामचा में गड़बड़ी की गई है, वहीं अधिकारियों द्वारा कोर्ट में गलत जानकारी भी प्रस्तुत की गई।

 क्या है पूरा मामला

यह मामला अब्दुल रज्जाक पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत की गई कार्रवाई और रिमांड के दौरान हुई एक कथित मारपीट की घटना से जुड़ा है।

पुलिस के अनुसार, रज्जाक को रिमांड पर लाया गया था, उसी दौरान अंकित मिश्रा नामक व्यक्ति के साथ उसका विवाद हुआ और मारपीट की घटना सामने आई।

हालांकि, इस मामले को लेकर पुलिस द्वारा जो घटनाक्रम पेश किया गया, वह कोर्ट में टिक नहीं सका और कई बिंदुओं पर विरोधाभास सामने आया।

 कोर्ट में खुली पुलिस की कहानी

सुनवाई के दौरान ओमती CSP सोनू कुर्मी और टीआई राजपाल सिंह बघेल ने कोर्ट को बताया कि अंकित मिश्रा अस्पताल में भर्ती था और वहीं घटना हुई।

लेकिन जब कोर्ट ने अस्पताल से जुड़े दस्तावेज मांगे, तो पुलिस अधिकारी कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सके और बाद में स्वीकार किया कि यह जानकारी गलत थी।

यानी जिस घटना को अस्पताल से जोड़कर प्रस्तुत किया गया, वह तथ्यात्मक रूप से गलत निकली।

 विदेश में था आरोपी, फिर भी दर्ज हो गया अपराध

पासपोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार, अब्दुल रज्जाक 30 दिसंबर 2019 से 14 जनवरी 2020 तक देश से बाहर था।

इसके बावजूद पुलिस ने उसी अवधि के दौरान जबलपुर में उसके द्वारा अपराध किए जाने की FIR दर्ज दिखाई।

कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी करते हुए इसे पुलिस की “खोखली कार्यप्रणाली” बताया।

 जांच अधिकारी की गैरहाजिरी पर उठे सवाल

कोर्ट ने 01 अप्रैल 2026 को एसपी संपत उपाध्याय को निर्देश दिए थे कि सभी संबंधित अधिकारियों और दस्तावेजों को पेश किया जाए।

इसके बावजूद मुख्य जांच अधिकारी बुंदेलधर द्विवेदी को कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया गया।

इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि यह पुलिस की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं है और यह लापरवाही को दर्शाता है।

रोजनामचा और साक्ष्यों में गंभीर गड़बड़ी

रोजनामचा एंट्री में समय को लेकर बड़ा अंतर पाया गया।

जहां आरोपी को रिमांड खत्म होने पर कोर्ट में पेश किया जाना था, वहां उसे थाने वापस ले जाने का उल्लेख किया गया।

इसके अलावा, कथित मारपीट के मामले में न तो CCTV फुटेज प्रस्तुत की गई और न ही स्वतंत्र गवाहों के बयान दर्ज किए गए।

 एक साल तक गलत बेंच में सुनवाई

यह याचिका जुलाई 2025 में दायर की गई थी, लेकिन तकनीकी त्रुटि के कारण यह करीब एक साल तक गलत बेंच में सुनी जाती रही।

बाद में महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने इस तथ्य को कोर्ट के सामने रखा, जिसके बाद मामला चीफ जस्टिस की बेंच में स्थानांतरित किया गया।

 अब आगे क्या

हाईकोर्ट ने पूरे मामले के रिकॉर्ड को सील कर दिया है और अब इसकी सुनवाई 06 अप्रैल 2026 को चीफ जस्टिस की डिविजन बेंच में होगी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अब किसी भी पक्ष को अनावश्यक समय नहीं दिया जाएगा।

 क्या आरोपी को मिलेगा फायदा?

जांच में सामने आई खामियां, गलत बयान और दस्तावेजी हेरफेर अब आरोपी के पक्ष में जा सकते हैं।

कमजोर साक्ष्य किसी भी केस की दिशा बदल सकते हैं।

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