प्रथम टुडे
जबलपुर।नगर निगम जबलपुर एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। इस बार मामला सीधे लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) की जांच से जुड़ा बताया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसी द्वारा कई माह पूर्व मांगी गई अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी आज तक उपलब्ध नहीं कराई गई, जिससे न केवल जांच की गति प्रभावित हुई बल्कि जांच को कमजोर करने की आशंका भी गहराती जा रही है।
सूत्र बताते हैं कि लोकायुक्त/EOW ने नगर निगम के स्थापना विभाग से सफाई सुपरवाइजर एवं स्वास्थ्य निरीक्षक पद से जुड़े कुछ अधिकारियों की
नियुक्ति प्रक्रिया
पदस्थापना आदेश
वेतन-भत्तों का विवरण
संपत्ति संबंधी जानकारी
मांगी थी। यह पूरा रिकॉर्ड जांच का अहम हिस्सा माना जा रहा था, लेकिन इसके बावजूद स्थापना विभाग द्वारा लगातार टालमटोल की गई।
पत्राचार हुआ, जवाब नहीं मिला
सूत्रों का कहना है कि जांच एजेंसी की ओर से एक नहीं, बल्कि कई बार पत्राचार किया गया। इसके बावजूद न तो पूरा रिकॉर्ड सौंपा गया और न ही किसी ठोस कारण का उल्लेख किया गया। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि
क्या जानबूझकर जानकारी छुपाई गई?
या फिर किसी दबाव में जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई?
जांच की जद में नाम, फिर भी संरक्षण?
मामला तब और ज्यादा संवेदनशील हो गया जब यह सामने आया कि जिन अधिकारियों के नाम जांच से जुड़े दस्तावेजों में दर्ज बताए जा रहे हैं, उन्हें न केवल विभागीय संरक्षण मिला, बल्कि पदोन्नति की प्रक्रिया भी आगे बढ़ा दी गई।
सूत्रों के मुताबिक,
अर्जुन यादव, राधा रैकवार और धर्मेंद्र राज
जैसे नाम पहले से ही जांच के संदर्भ में दर्ज बताए जा रहे हैं। इसके बावजूद न तो जांच पूरी होने तक कोई प्रशासनिक रोक लगाई गई और न ही प्रमोशन प्रक्रिया पर विराम लगाया गया।
प्रमोशन के फैसले ने बढ़ाई हलचल
नगर निगम में आज हुए प्रमोशन के बाद मामला और गरमा गया है। जानकारी के अनुसार—
एक अधिकारी को सहायक स्वास्थ्य अधिकारी पद पर पदोन्नत किया गया
एक महिला अधिकारी को Chief Sanitary Inspector (CSI) के पद पर पदोन्नति दी गई
शहर में चर्चा है कि जब जांच एजेंसी द्वारा मांगी गई जानकारी अब तक लंबित है, ऐसे समय में प्रमोशन का निर्णय संदेह को और गहरा करता है।
उठते हैं कई गंभीर सवाल
इस पूरे मामले ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं—
क्या जांच के दायरे में आए अधिकारियों को जानबूझकर लाभ पहुंचाया गया?
लोकायुक्त/EOW की मांग को किसके निर्देश पर नजरअंदाज किया गया?
क्या स्थापना विभाग ने रिकॉर्ड दबाकर जांच को कमजोर करने का प्रयास किया?
क्या प्रमोशन के जरिए संभावित कार्रवाई से पहले “सुरक्षा कवच” देने की कोशिश हुई?
जिम्मेदारी किसकी?
प्रशासनिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि समय रहते पूरी जानकारी जांच एजेंसी को सौंप दी जाती, तो कई अहम तथ्य सामने आ सकते थे। अब सवाल यह है कि
क्या स्थापना विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
क्या लोकायुक्त/EOW इस मामले में कड़ा रुख अपनाएगा?
फिलहाल नगर निगम प्रशासन की ओर से इस पूरे प्रकरण पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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