जाली MBBS डिग्री और फर्जी MCI रजिस्ट्रेशन के सहारे सरकारी नौकरी, जबलपुर से भोपाल तक फैला रैकेट
जबलपुर/मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में एक बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है, जिसने सरकारी भर्ती प्रक्रिया और दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश के संजीवनी क्लीनिकों में फर्जी एमबीबीएस डिग्री और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) के जाली रजिस्ट्रेशन के आधार पर कथित डॉक्टरों के नौकरी करने का मामला सामने आया है। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अब तक तीन फर्जी डॉक्टरों सहित पूरे नेटवर्क के मास्टरमाइंड को गिरफ्तार कर लिया है।
डेढ़ साल से नौकरी कर रहा था फर्जी डॉक्टर
जांच में सबसे बड़ा खुलासा जबलपुर के संजीवनी क्लीनिक में संविदा पर पदस्थ अजय मौर्य को लेकर हुआ। बताया जा रहा है कि वह पिछले लगभग डेढ़ साल से डॉक्टर बनकर नौकरी कर रहा था और हर महीने करीब 80 हजार रुपये वेतन ले रहा था।
स्थानीय लोगों और क्लीनिक स्टाफ के अनुसार, अजय मौर्य को चिकित्सकीय कार्यों की व्यावहारिक जानकारी तक नहीं थी। वह प्रतिदिन केवल कुछ समय के लिए क्लीनिक पहुंचता, उपस्थिति दर्ज करता और वापस चला जाता था।
स्टाफ के भरोसे चल रहा था क्लीनिक
पूछताछ में सामने आया कि मरीजों की जांच, दवाइयों की जानकारी और प्राथमिक उपचार जैसे अधिकांश कार्य नर्सिंग स्टाफ और कंपाउंडर ही संभाल रहे थे। कथित डॉक्टर की भूमिका केवल औपचारिक उपस्थिति तक सीमित थी। इससे मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर खतरा मंडरा रहा था।
दमोह और जबलपुर से तीन आरोपी गिरफ्तार
पुलिस ने अब तक इस मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जो नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के तहत संविदा पर नियुक्त थे।
गिरफ्तार आरोपी
अजय मौर्य — संजीवनी क्लीनिक, जबलपुर
सचिन यादव — दमोह
राजपाल गौर — दमोह
बताया जा रहा है कि ये सभी आरोपी लंबे समय से फर्जी दस्तावेजों के सहारे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत थे।
भोपाल से पकड़ा गया रैकेट का मास्टरमाइंड
इस पूरे फर्जीवाड़े का मुख्य आरोपी हीरा सिंह कौशल बताया जा रहा है, जिसे पुलिस ने भोपाल से गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार, वही युवाओं को फर्जी मेडिकल डिग्री और जाली रजिस्ट्रेशन उपलब्ध कराता था।
8 से 10 लाख रुपये में बिकती थी फर्जी डिग्री
पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि आरोपी युवाओं से 8 से 10 लाख रुपये तक वसूलता था। इसके बदले उन्हें हूबहू असली जैसी दिखने वाली MBBS डिग्री और MCI के नकली रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट दिए जाते थे। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर संविदा भर्ती में नौकरी हासिल की जाती थी।
70 से अधिक फर्जी डॉक्टर रडार पर
सूत्रों के मुताबिक यह मामला केवल तीन आरोपियों तक सीमित नहीं है। आशंका जताई जा रही है कि प्रदेश के कई जिलों, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, 70 से अधिक फर्जी डॉक्टर सक्रिय हो सकते हैं।
पुलिस अब मास्टरमाइंड से पूछताछ कर उन सभी लोगों की सूची तैयार कर रही है जिन्होंने फर्जी डिग्रियां खरीदी थीं।
स्वास्थ्य विभाग में मचा हड़कंप
मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और एनएचएम प्रशासन में हड़कंप की स्थिति है। विभाग ने प्रदेशभर के CMHO को सभी डॉक्टरों के दस्तावेजों का दोबारा सत्यापन कराने के निर्देश जारी किए हैं।
सभी दस्तावेजों का होगा री-वेरिफिकेशन
अब संजीवनी क्लीनिकों और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों में पदस्थ डॉक्टरों की डिग्री, डिप्लोमा और मेडिकल रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट की फिजिकल और डिजिटल जांच की जा रही है। जिनके दस्तावेज संदिग्ध पाए जाएंगे, उन्हें तत्काल सेवा से हटाकर एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
विभागीय मिलीभगत की भी जांच
पुलिस इस पहलू की भी जांच कर रही है कि कहीं स्वास्थ्य विभाग के कुछ अधिकारी या कर्मचारी भी इस पूरे नेटवर्क में शामिल तो नहीं थे। अधिकारियों का मानना है कि बिना आंतरिक सहयोग के इतने बड़े स्तर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्तियां होना संभव नहीं लगता।
मरीजों की जान से खिलवाड़ का बड़ा मामला
विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ आर्थिक घोटाला नहीं, बल्कि आम लोगों की जिंदगी से जुड़ा गंभीर अपराध है। फर्जी डॉक्टरों द्वारा इलाज किए जाने से हजारों मरीजों की जान खतरे में पड़ सकती थी। अब इस खुलासे के बाद पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।

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