₹3500 करोड़ राजस्व अटका, छत्तीसगढ़ मॉडल देखने जाएंगे अफसर
मध्यप्रदेश में आबकारी विभाग की नीलामी प्रक्रिया इस बार बड़े संकट में फंसती नजर आ रही है। 12 राउंड की टेंडरिंग के बाद भी प्रदेश की 489 शराब दुकानें बिना बिके रह गई हैं। इन दुकानों से सरकार को करीब 19 हजार 952 करोड़ रुपए के राजस्व की उम्मीद थी, लेकिन अब भी करीब 3500 करोड़ रुपए की राशि जुटनी बाकी है।
शनिवार, 4 अप्रैल को आयोजित 13वें राउंड की ई-टेंडरिंग में भी स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ। इस दौरान आए ऑफर रिजर्व प्राइस से 20 से 40 प्रतिशत तक कम रहे। इससे पहले के 12 राउंड में भी सीमित प्रतिस्पर्धा देखने को मिली थी, जिससे नीलामी प्रक्रिया लगातार प्रभावित रही।
30% से नीचे ऑफर पर सहमति, लेकिन विवाद
शुक्रवार देर शाम शराब दुकानों की नीलामी के लिए बनी कैबिनेट कमेटी की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई। बैठक में आबकारी अधिकारियों ने 30 प्रतिशत से नीचे आए ऑफर स्वीकार करने पर सहमति जताई, लेकिन इसे लेकर मतभेद भी सामने आए।
कैबिनेट कमेटी के सदस्य और मंत्री उदय प्रताप सिंह ने इसे कानूनी रूप से उचित नहीं बताया और सुझाव दिया कि बची हुई 489 दुकानों को निगम बनाकर संचालित किया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ मॉडल क्या है, क्यों अहम
इसके बाद आबकारी विभाग ने दो अधिकारियों को छत्तीसगढ़ भेजने का फैसला किया है, जहां पहले से शराब दुकानें सरकारी निगम के जरिए संचालित की जा रही हैं। इस मॉडल में दुकानों को निजी ठेकेदारों को देने के बजाय सरकार खुद संचालन करती है, जिससे राजस्व सीधे सरकारी खाते में जाता है।
मध्यप्रदेश सरकार अब इसी व्यवस्था को अपनाने की संभावनाएं तलाश रही है, ताकि नीलामी में आ रही बाधाओं से बचा जा सके।
6 से 9 अप्रैल में आएगी रिपोर्ट
आबकारी विभाग ने प्रभारी उपायुक्त आलोक कुमार खरे और सहायक आबकारी आयुक्त सत्यनारायण दुबे को इस अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपी है। दोनों अधिकारी 6 से 9 अप्रैल के बीच अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेंगे। इसी रिपोर्ट के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।
बाजार में देसी शराब और बीयर की किल्लत
इस पूरी स्थिति का असर अब बाजार में भी दिखाई देने लगा है। एक अप्रैल से लागू नई आबकारी नीति के बाद प्रदेश की करीब 40 प्रतिशत दुकानों पर स्टॉक न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। कई स्थानों पर देसी शराब और बीयर की कमी की स्थिति बन गई है, जबकि कुछ जगहों पर ऊंचे दामों पर बिक्री की शिकायतें भी सामने आ रही हैं।
डिस्ट्रीब्यूटर और सप्लाई चेन भी प्रभावित
प्रदेश में सप्लाई का बड़ा हिस्सा एक डिस्ट्रीब्यूटर समूह के पास था। हाईकोर्ट द्वारा लाइसेंस निलंबन बरकरार रखे जाने के बाद सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। वैकल्पिक कंपनियों से सप्लाई शुरू होने में समय लग रहा है, जिससे बाजार में शॉर्टेज बनी हुई है।
नए ठेकेदारों को डिपो से माल उठाने और दुकानों तक पहुंचाने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उपभोक्ताओं को मनचाहा ब्रांड नहीं मिल पा रहा।
सरकार के राजस्व को हर दिन नुकसान
इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर सरकार के राजस्व पर पड़ रहा है। नई नीति में रिजर्व प्राइस बढ़ाने के बावजूद सप्लाई बाधित होने से सरकार की कमाई घट रही है और रोजाना नुकसान उठाना पड़ रहा है।
कैबिनेट कमेटी की बैठक के बाद यह साफ हो गया है कि सरकार को जल्द कोई बड़ा फैसला लेना होगा। अब निगाहें अधिकारियों की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिसके बाद तय होगा कि 489 दुकानों का संचालन किस मॉडल पर किया जाएगा।

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