पूर्व महापौर प्रभात साहू समेत 5 आरोपी घेरे में, पुलिस की शुरुआती कार्रवाई पर उठे सवाल
जबलपुर के बहुचर्चित “सड़क पर सत्ता बनाम वर्दी” मामले में STF जांच ने पूरे घटनाक्रम की परतें खोल दी हैं। जिस केस में शुरुआत में आरोपियों को “अज्ञात” बताकर FIR दर्ज की गई थी, अब उसी में पूर्व महापौर प्रभात साहू समेत 5 लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया है।
हाईकोर्ट की सख्ती और STF की जांच के बाद इस केस की दिशा पूरी तरह बदल गई है, जिससे शुरुआती पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
क्या है पूरा मामला? (ग्राउंड से समझिए)
यह विवाद 18 सितंबर 2025 को हेलमेट चेकिंग के दौरान शुरू हुआ था।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, वाहन रोकने पर विवाद बढ़ा और आरोप है कि पूर्व महापौर ने अपने समर्थकों को मौके पर बुला लिया।
कुछ ही देर में भीड़ इकट्ठा हो गई और मामला पुलिसकर्मियों से झड़प, विवाद और कानून-व्यवस्था को चुनौती देने तक पहुंच गया।
यही वजह रही कि इस पूरे घटनाक्रम को “सड़क पर सत्ता बनाम वर्दी” के रूप में देखा जाने लगा।
“अज्ञात” का खेल कैसे हुआ बेनकाब
घटना के बाद पुलिस ने दो अलग-अलग तरह की कार्रवाई की—
एक तरफ पुलिसकर्मी के खिलाफ तुरंत नामजद FIR दर्ज
दूसरी तरफ अन्य आरोपियों को “अज्ञात” बताकर मामला दर्ज
यही दोहरा रवैया इस केस का सबसे बड़ा विवाद बना और मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया।
अब STF जांच में यह साफ हुआ कि जिन लोगों को “अज्ञात” बताया गया था, उनकी पहचान पहले से स्पष्ट थी।
किन धाराओं में केस दर्ज?
STF जांच के बाद आरोपियों पर—
मारपीट
धमकी
शासकीय कार्य में बाधा
जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं।
साथ ही BNS 2023 और मोटर व्हीकल एक्ट के तहत भी कार्रवाई की गई है।
चालान पेश होने पर नया विवाद
सूत्रों के अनुसार आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया जा चुका है, जबकि STF की रिपोर्ट अभी भी हाईकोर्ट में सीलबंद लिफाफे में है।
जनहित याचिकाकर्ता अधिवक्ता मोहित वर्मा ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि कोर्ट में लंबित मामले और STF रिपोर्ट पर विचार से पहले चालान पेश हुआ है, तो यह अवमानना का विषय बन सकता है।
उन्होंने इस मुद्दे को अदालत के सामने रखने की बात कही है।
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जनहित याचिका से खुला ‘दबाव का खेल’
अधिवक्ता मोहित वर्मा की जनहित याचिका ने इस केस को निर्णायक मोड़ दिया।
जब कोर्ट के सामने दोनों FIR और तथ्य रखे गए, तो यह संकेत मिला कि कहीं न कहीं कार्रवाई पर दबाव था।
इसी वजह से अदालत को सीधे हस्तक्षेप करना पड़ा और STF जांच के आदेश दिए गए।
रसूख की दीवार टूटी, सच आया सामने
यह मामला एक बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है कि
जब जांच निष्पक्ष एजेंसी के हाथ में जाती है, तो प्रभाव और दबाव की दीवारें टूट जाती हैं
राजनीतिक रसूख कितना भी बड़ा क्यों न हो, कानून के दायरे में आने से कोई नहीं बच सकता — STF जांच ने यही संदेश दिया है।
अब कोर्ट का फैसला बाकी
मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल 2026 को निर्धारित है।
अब पूरी नजर हाईकोर्ट पर टिकी है, जहां STF रिपोर्ट और प्रस्तुत चालान के आधार पर आगे की दिशा तय होगी।
हालांकि इतना स्पष्ट है कि इस केस में “अज्ञात” से “नामजद” तक का सफर खुद एक बड़ा खुलासा बन चुका है।

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