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Saturday, March 21, 2026

पश्चिम एशिया संकट का असर: पेट्रोल से ज्यादा गैस पर मार, क्या लौटेंगे पारंपरिक ऊर्जा स्रोत?

 रसोई गैस की किल्लत और बढ़ती कीमतों के बीच मिट्टी तेल, लकड़ी और अन्य विकल्पों की फिर बढ़ रही चर्चा


जबलपुर
।पश्चिम एशिया में जारी वैश्विक तनाव का असर अब भारत के आम जनजीवन पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। जहां पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है, वहीं रसोई गैस (एलपीजी) की उपलब्धता और कीमतें आम लोगों के लिए बड़ी चिंता बनती जा रही हैं।

शहरों से लेकर कस्बों तक गैस सिलेंडर के लिए लंबी कतारें लग रही हैं, वहीं डिलीवरी में देरी और कीमतों में बढ़ोतरी ने घरेलू बजट को प्रभावित किया है। खासतौर पर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवार इस संकट से सबसे ज्यादा जूझ रहे हैं।

गैस संकट के बीच पुराने विकल्पों की याद

गैस की कमी के चलते अब एक बार फिर पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की चर्चा शुरू हो गई है। जिन साधनों को समय के साथ पीछे छोड़ दिया गया था, वे अब मजबूरी में फिर विकल्प बनते नजर आ रहे हैं। इनमें प्रमुख रूप से—

मिट्टी तेल (केरोसिन) – पहले ग्रामीण और शहरी गरीब वर्ग का मुख्य ईंधन रहा, अब फिर इसकी मांग बढ़ने लगी है।

लकड़ी और कोयला – गांवों और कुछ शहरी क्षेत्रों में लोग चूल्हों की ओर लौटने लगे हैं।

गोबर गैस (बायोगैस) – ग्रामीण क्षेत्रों में एक बार फिर इस पर ध्यान दिया जा रहा है।

कृषि अपशिष्ट (पराली आदि) – कई जगहों पर अस्थायी ईंधन के रूप में इस्तेमाल बढ़ा है।

स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खतरा

हालांकि इन पारंपरिक साधनों की वापसी अपने साथ कई गंभीर चुनौतियां भी लेकर आ रही है। लकड़ी और कोयले के उपयोग से वायु प्रदूषण बढ़ने का खतरा है, वहीं घरों के अंदर धुएं से महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

नीतिगत चुनौती भी बढ़ी

सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है—एक ओर गैस की सप्लाई को सुचारू बनाए रखना और दूसरी ओर लोगों को स्वच्छ ऊर्जा की ओर बनाए रखना। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है, तो देश को ऊर्जा के वैकल्पिक और स्थानीय स्रोतों को फिर से मजबूत करना होगा।

आने वाले समय में क्या?

वर्तमान हालात संकेत दे रहे हैं कि यदि वैश्विक स्तर पर स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो भारत में ऊर्जा संकट और गहरा सकता है। ऐसे में पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की अस्थायी वापसी तो हो सकती है, लेकिन दीर्घकालीन समाधान के लिए सस्ती, सुलभ और स्वच्छ ऊर्जा पर फोकस करना ही जरूरी होगा।

पेट्रोल संकट के बीच इलेक्ट्रिक विकल्प की ओर झुकाव

जहां रसोई गैस की किल्लत ने लोगों को पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की ओर लौटने पर मजबूर किया है, वहीं परिवहन क्षेत्र में एक अलग बदलाव देखने को मिल रहा है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अनिश्चितता और वैश्विक संकट के असर के बीच अब लोग धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर रुख करते नजर आ रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और उछाल आ सकता है, जिससे पेट्रोल-डीजल और महंगे होंगे। ऐसे में आम उपभोक्ता खर्च कम करने के लिए इलेक्ट्रिक विकल्प को अपनाने पर विचार कर सकता है।

शहरों में पहले से ही ई-रिक्शा और इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों का चलन बढ़ रहा है, वहीं अब चार पहिया इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग भी धीरे-धीरे बढ़ती दिखाई दे रही है। हालांकि चार्जिंग स्टेशन और शुरुआती लागत जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं, लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाले समय में भारत में पेट्रोल पर निर्भरता कम हो सकती है।

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