प्रथम टुडे जबलपुर।
कभी 52 ताल-तलैयों का शहर कहलाने वाला जबलपुर अब तालाबों की बदहाली और कब्जों की मार झेल रहा है। सोमवार को राजस्व अधिकारियों की बैठक में कलेक्टर ने तालाब संरक्षण को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए सख्त निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि शहर के सभी तालाबों का जल्द सीमांकन किया जाए और उन पर स्थाई चिन्ह लगाए जाएं। साथ ही जिन तालाबों पर अवैध कब्जा है, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। कलेक्टर ने साफ शब्दों में चेतावनी दी— “इस मामले में किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
कभी 52 ताल-तलैयों से सजा था शहर
गोंडवाना शासन काल में जबलपुर में 52 बड़े और छोटे तालाब बनाए गए थे। इनमें से कई तालाब 100 एकड़ से ज्यादा क्षेत्रफल में फैले हुए थे। रानीताल, चेरीताल, मढ़ाताल, श्रीनाथ की तलैया, तिलकभूमि की तलैया, हनुमानताल, संग्रामसागर, अधारताल, देवताल, सूपाताल, फूटाताल, हाथीताल, गंगासागर, तीनतलैया, कदम तलैया, बघाताल, गुलौआ ताल, ठाकुरताल, खम्बताल, शाही तालाब, मढाताल और जूडीतलैया जैसे तालाब कभी इस शहर की पहचान हुआ करते थे।
लेकिन वक्त के साथ तालाबों की जगह कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए। भू-माफियाओं ने तालाबों की जमीन पाटकर प्लॉटिंग कर दी और प्रशासनिक लापरवाही ने इन्हें उजड़ने दिया। नतीजतन, आज इनमें से कई तालाब केवल नाम भर ही बचे हैं।
गोंड राजाओं की अद्भुत इंजीनियरिंग
लगभग 400 साल पहले गोंड राजाओं ने जब इन तालाबों का निर्माण कराया था, तो उनकी सोच केवल पानी संग्रह करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने एक वैज्ञानिक और अद्भुत व्यवस्था खड़ी की थी।
देवताल, जो ऊंचाई पर स्थित है, से पानी निकालकर नीचे देवताल में आता था, वहां से आगे सूपाताल में और फिर छोटे-छोटे तालाबों तक पहुंचता था। इस तरह तालाबों की श्रृंखला बनाकर वर्षा जल संग्रहित किया जाता और सालभर पीने व खेती के लिए पानी उपलब्ध रहता। यह व्यवस्था आज भी कुछ हिस्सों में देखी जा सकती है। देवताल में आज भी पानी की प्रचुरता है और उसमें खिले कमल इस बात के साक्षी हैं। सूपाताल में इतनी गहराई है कि सालभर पानी रहता है।
इस व्यवस्था को देखकर आज भी विशेषज्ञ मानते हैं कि उस दौर की जल-संरचना की इंजीनियरिंग आज की आधुनिक तकनीक को भी चुनौती देती है। वाटर हार्वेस्टिंग और वॉटर ट्रीटमेंट का जो अद्भुत नमूना गोंड राजाओं ने पेश किया था, वह शहर के लिए बेशकीमती धरोहर है।
तालाब श्रृंखला की खासियत
मदन महल पहाड़ी क्षेत्र में तालाबों की ऐसी श्रृंखला है जिसमें पहाड़ी के ऊपर बने तालाब का पानी नीचे बने दूसरे तालाब में पहुंचता और फिर वहां से तीसरे तालाब तक जाता। इससे न केवल पानी का सतत प्रवाह बना रहता बल्कि भूजल भी समृद्ध होता। यही कारण था कि पुराने दौर में इन तालाबों का पानी कभी खत्म नहीं होता था।
संरक्षण की ज़रूरत
पर्यावरणविदों का कहना है कि तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं बल्कि शहर का पारिस्थितिकी तंत्र हैं। ये नमी, तापमान, जैव-विविधता और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं। आज जब जलवायु परिवर्तन और जल संकट की समस्या सामने है, तब तालाबों को बचाना और भी जरूरी हो गया है।
कलेक्टर की इस सख्त पहल से उम्मीद जगी है कि जबलपुर के बचे हुए तालाबों को न केवल कब्जों से मुक्त किया जाएगा, बल्कि उन्हें उनके पुराने स्वरूप में लाने के लिए ठोस कदम भी उठाए जाएंगे।

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