बरगी हादसे के ग्वारीघाट तो भेड़ाघाट में भी किसी हादसे के इंतजार मैं है प्रशासन
जोखिम उठाकर ग्वारीघाट में आज भी वाहन से भरी नाव पर करवा रहे हैं नाविक
10 से 20 रुपए किराया देकर वाहन चालक भी अपनी जान जोखिम में डालकर नव से पार करके लाते हैं वाहानव
जबलपुर। बरगी बांध में हाल ही में हुए क्रूज हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है, लेकिन ऐसा लगता है कि जबलपुर जिला प्रशासन अभी भी गहरी नींद में है। बरगी की घटना के बाद भी ग्वारीघाट और भेड़ाघाट जैसे प्रमुख पर्यटन केंद्रों पर सुरक्षा के दावों की पोल खुल रही है। यहाँ नियमों को ताक पर रखकर जिस तरह से नौका संचालन हो रहा है, वह स्पष्ट रूप से किसी बड़ी त्रासदी के इंतजार का संकेत दे रहा है।
ग्वारीघाट: नावों पर लदे वाहन और गहराता जोखिम
ग्वारीघाट से गुरुद्वारा या बरगी की ओर जाने वाले लोग पिछले कई वर्षों से जान जोखिम में डालकर नर्मदा पार कर रहे हैं। यहाँ चौंकाने वाली बात यह है कि छोटी नावों में न केवल क्षमता से अधिक लोग बैठते हैं, बल्कि दोपहिया वाहनों को भी नावों पर लादकर पार कराया जाता है। नर्मदा के बीचों-बीच जहाँ गहराई अत्यधिक है, वहाँ बिना किसी सुरक्षा मापदंड के वाहनों को नाव पर ले जाना आत्मघाती कदम है। प्रशासन ने आज तक न तो यहाँ लाइफ जैकेट अनिवार्य की है और न ही वाहनों के इस प्रकार के परिवहन पर रोक लगाई है।
मात्र 10-20 रुपये के लिए दांव पर लगी जिंदगी
ग्वारीघाट में नाव संचालक एक वाहन पार कराने के बदले मात्र 10 से 20 रुपये का किराया वसूलते हैं। चंद रुपयों के इस फेर में नाविक और वाहन चालक दोनों ही अपनी जान जोखिम में डालते हैं। बरसात के दिनों में जब नर्मदा का जलस्तर बढ़ा होता है और बहाव तेज होता है, तब भी यह सिलसिला थमता नहीं है। सुरक्षा के नाम पर यहाँ केवल मानसून के दौरान होमगार्ड की नावें दिखाई देती हैं, बाकी समय यात्री और पर्यटक पूरी तरह भगवान भरोसे रहते हैं।
भेड़ाघाट: दिखावे की सुरक्षा और नियमों की अनदेखी
विश्व प्रसिद्ध भेड़ाघाट के पंचवटी से बंदर कूदनी तक होने वाला नौका विहार भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। हालांकि यहाँ पर्यटकों को लाइफ जैकेट दी जाती है, लेकिन कई पर्यटक इसे पहनने में लापरवाही बरतते हैं। प्रशासन और नाविकों की ओर से कोई सख्ती न होने के कारण सुरक्षा के नियम केवल कागजों तक सीमित हैं। संगमरमरी वादियों के बीच गहरे पानी में नौका विहार करते समय अगर कोई अनहोनी होती है, तो उसके लिए जिम्मेदार कौन होगा?
क्या हादसे के बाद ही जागेगा प्रशासन?
अक्सर देखा गया है कि प्रशासन किसी बड़ी घटना के घटित होने के बाद ही सक्रिय होता है और जांच कमेटियां बैठाई जाती हैं। बरगी डैम की घटना एक चेतावनी थी, लेकिन ग्वारीघाट और भेड़ाघाट की वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि प्रशासन 'मूकदर्शक' बना हुआ है। सुरक्षा उपकरणों की कमी, नावों की फिटनेस जांच का अभाव और क्षमता से अधिक सवारी भरने पर रोक न लगाना, यह दर्शाने के लिए काफी है कि हम पुराने हादसों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं।
निष्कर्ष:
अगर समय रहते ग्वारीघाट में नावों पर वाहन ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया और भेड़ाघाट में लाइफ जैकेट की अनिवार्यता को कड़ाई से लागू नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब बरगी जैसा मंजर यहाँ भी देखने को मिल सकता है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इन घाटों पर सुरक्षा पुख्ता करता है या फिर एक और हादसे का इंतजार करता है।
- प्रथम टुडे (सच की बात सबके साथ)

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