मां… जिसके लिए कोई एक दिन काफी नहीं - Pratham Today, Sach Ki Baat SabKe Saath -->

Breaking

Sunday, May 10, 2026

मां… जिसके लिए कोई एक दिन काफी नहीं

 मदर्स डे स्पेशल



कहते हैं कि भगवान हर जगह नहीं हो सकते थे, इसलिए उन्होंने मां बनाई।

यह सिर्फ एक पंक्ति नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।

आज दुनिया “मदर्स डे” मना रही है। सोशल मीडिया पर तस्वीरें लगेंगी, स्टेटस लगाए जाएंगे, बड़े-बड़े संदेश लिखे जाएंगे, मां के साथ सेल्फियां साझा होंगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या मां को सच में किसी एक दिन की जरूरत है? क्या मां का सम्मान सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख में सीमित किया जा सकता है?

हमारे हिंदुस्तान की संस्कृति तो कहती है कि यहां हर दिन मां का होता है।

सुबह आंख खुलते ही सबसे पहला शब्द अक्सर “मां” ही निकलता है। चोट लगे तो “मां”, दुख हो तो “मां”, खुशी मिले तो भी सबसे पहले याद “मां” ही आती है। क्योंकि मां केवल एक रिश्ता नहीं, वह जीवन का पहला अहसास है।

आज के आधुनिक दौर में रिश्तों को भी दिनों में बांट दिया गया है।

मदर्स डे, फादर्स डे, फ्रेंडशिप डे… शायद इसलिए क्योंकि भागती-दौड़ती जिंदगी में लोगों के पास अपने रिश्तों के लिए समय कम पड़ गया है। इंसान इतना व्यस्त हो गया कि उसे याद दिलाने के लिए अलग-अलग दिन बनाने पड़े कि मां को भी समय दे दो, पिता से भी बात कर लो, दोस्तों को भी याद कर लो।

लेकिन भारतीय संस्कृति की खूबसूरती यही है कि यहां मां को सिर्फ परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि ईश्वर से भी ऊपर माना गया है।

“मातृ देवो भवः” — यानी मां को देवता समान मानो।

यह केवल श्लोक नहीं, हमारी सभ्यता की आत्मा है।

रामायण में भगवान राम ने पिता के वचनों का पालन कर वनवास स्वीकार किया, लेकिन वहां भी मां का सम्मान सर्वोपरि रहा। कैकेयी उनकी सगी मां नहीं थीं, फिर भी राम ने उन्हें वही आदर दिया जो एक पुत्र अपनी मां को देता है। यह भारतीय संस्कारों की सबसे बड़ी पहचान है कि रिश्ता खून से नहीं, सम्मान से बड़ा होता है।

महाभारत में भी मां के शब्दों को सर्वोच्च माना गया। जब पांचों पांडव द्रौपदी को लेकर घर पहुंचे और माता कुंती ने बिना देखे कह दिया — “जो लाए हो, आपस में बांट लो”, तब पुत्रों ने उसे मां का आदेश मानकर स्वीकार किया। यह घटना केवल कथा नहीं, बल्कि उस युग में मां के स्थान को दर्शाती है।

आज समय बदल गया है

मोबाइल की स्क्रीन बड़ी हो गई, लेकिन परिवार के साथ बैठने का समय छोटा हो गया।

घर बड़े हो गए, लेकिन रिश्तों में दूरियां बढ़ गईं।

लोग मां से प्यार तो करते हैं, लेकिन कई बार उसे जताने का समय नहीं निकाल पाते।

कई मांएं आज भी अपने बच्चों के फोन का इंतजार करती हैं।

कई बुजुर्ग मांएं सिर्फ इस उम्मीद में दरवाजे की ओर देखती रहती हैं कि शायद बेटा आज जल्दी घर आ जाए।

कई मांएं अपने दर्द छुपाकर सिर्फ इसलिए मुस्कुरा देती हैं ताकि बच्चों की जिंदगी पर बोझ न पड़े।

सच तो यह है कि मां कभी अपने लिए नहीं जीती।

वह अपने हिस्से की खुशियां भी बच्चों के नाम कर देती है।

बच्चे बड़े हो जाते हैं, लेकिन मां की चिंता कभी बूढ़ी नहीं होती।

इसलिए अगर आज मदर्स डे है, तो सिर्फ सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने तक इसे सीमित मत रखिए।

मां के पास बैठिए।

उनसे बात कीजिए।

उनकी दवा, उनका स्वास्थ्य, उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखिए।

हो सकता है बहस भी हो, नाराजगी भी हो, पीढ़ियों का फर्क भी हो… लेकिन मां से रिश्ता कभी खत्म नहीं होना चाहिए।

मां से लड़ लीजिए, झगड़ लीजिए, रूठ जाइए…

लेकिन मां को कभी अकेला मत छोड़िए।

क्योंकि जिस दिन मां चली जाती है, उस दिन इंसान समझता है कि उसके जीवन से सबसे बड़ा आशीर्वाद चला गया।

मदर्स डे पर सभी माताओं को प्रणाम।

उन सभी मांओं को नमन, जो बिना किसी अपेक्षा के अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी समर्पित कर देती हैं।

और अंत में बस इतना —

मां के लिए कोई एक दिन नहीं होता…

मां से ही हर दिन होता है।

No comments:

Post a Comment