जबलपुर। संस्कारधानी की सड़कों पर इन दिनों नियम नहीं, बल्कि नेताओं की 'तस्वीरें' बोल रही हैं। शहर की लाइफलाइन मानी जाने वाली सड़कों के डिवाइडर और उन पर लगे स्ट्रीट लाइट के खंभे अब रोशनी देने के बजाय हादसों को न्योता दे रहे हैं। विडंबना यह है कि राजनीति की इस चमक में आम राहगीरों की सुरक्षा पूरी तरह अंधेरे में गुम हो चुकी है। शहर के प्रमुख चौराहों और रोड कट्स पर लगे अवैध होर्डिंग 'मौत का जाल' बन गए हैं, लेकिन प्रशासन मूकदर्शक बना किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है।
रोड कट्स पर 'ब्लाइंड स्पॉट': मुड़ते ही सामने खड़ी दिखती है मौत
शहर की यातायात व्यवस्था में सबसे खतरनाक स्थिति उन 'रोड कट्स' (U-Turns) पर है, जहाँ डिवाइडर के बीच से वाहन मुड़ते हैं। कायदे से इन मोड़ों पर विजिबिलिटी बिल्कुल साफ होनी चाहिए, लेकिन यहाँ स्ट्रीट लाइट के खंभों पर कतार से लगे बड़े-बड़े फ्लेक्स और होर्डिंग ने 'ब्लाइंड स्पॉट' पैदा कर दिया है। जब कोई वाहन चालक डिवाइडर से दूसरी ओर मुड़ने का प्रयास करता है, तो खंभों पर टंगे ये अवैध विज्ञापन सामने से आने वाले तेज रफ्तार ट्रैफिक को पूरी तरह छिपा लेते हैं। महज कुछ इंच की दूरी से वाहन टकराने की घटनाएं अब जबलपुर के लिए आम बात हो गई हैं।
आंधी-बारिश में 'आसमानी आफत' बने फ्लेक्स
बीते कुछ दिनों में हुई हल्की आंधी और तेज हवाओं ने नगर निगम के दावों की पोल खोल दी है। शहर के कई मुख्य मार्गों पर घटिया तरीके से बांधे गए ये भारी-भरकम होर्डिंग और लोहे के फ्रेम उखड़कर सीधे सड़कों पर आ गिरे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कई जगहों पर ये फटे हुए फ्लेक्स घंटों तक सड़कों पर पड़े रहे या खंभों से झूलते रहे, जिससे दुपहिया वाहन चालकों के गले में फंसने या बैलेंस बिगड़ने का खतरा बना रहा। गनीमत रही कि अब तक कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ, लेकिन जर्जर खंभों पर लदे इन विज्ञापनों का बोझ कभी भी किसी बड़ी त्रासदी का कारण बन सकता है।
नियमों का चीरहरण: रसूख के आगे बेबस तंत्र
लोक संपत्ति विरूपण अधिनियम की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बिजली के खंभे और सरकारी ढांचे व्यक्तिगत प्रचार के लिए नहीं हैं, फिर भी शहर का शायद ही कोई ऐसा कोना बचा हो जो इन विज्ञापनों से मुक्त हो। सबसे चौंकाने वाला पहलू अधिकारियों का रवैया है। नाम न छापने की शर्त पर अधिकारी स्वीकार करते हैं कि ये होर्डिंग अवैध हैं और इनसे दुर्घटना का खतरा बना रहता है, लेकिन जैसे ही कार्रवाई की बात आती है, 'ऊपर से फोन' आ जाने का डर उन्हें पीछे खींच लेता है। नतीजा यह है कि आम जनता की जान से ज्यादा नेताओं की नाराजगी का ख्याल रखा जा रहा है।
चौराहों का दम घोंटते 'सियासी चेहरे'
शहर के व्यस्ततम चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल और दिशा-निर्देश बोर्ड के ठीक बगल में या उनके ऊपर ही ये होर्डिंग लगा दिए गए हैं। इससे वाहन चालकों का ध्यान भटकता है और कई बार उन्हें सिग्नल स्पष्ट दिखाई नहीं देते। रानीताल, दमोह नाका, मदन महल और ओमती जैसे इलाकों में स्थिति और भी भयावह है। डिवाइडर से बाहर निकले ये होर्डिंग एक-एक फुट तक सड़क घेरे रहते हैं, जिससे संकरी सड़कों पर दुर्घटना की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
निष्कर्ष: हादसे के बाद ही खुलेगी नींद?
सवाल यह उठता है कि क्या जबलपुर प्रशासन और नगर निगम किसी मासूम की बलि चढ़ने का इंतजार कर रहे हैं? पूर्व में भी देश के अन्य शहरों में अवैध होर्डिंग गिरने से कई लोगों की जान जा चुकी है, बावजूद इसके संस्कारधानी में कोई सबक नहीं लिया जा रहा। यदि समय रहते इन 'विजुअल बैरियर्स' को नहीं हटाया गया और रोड कट्स को विज्ञापन मुक्त नहीं किया गया, तो शहर की ये सड़कों पर सजी 'मुस्कान' किसी के घर के मातम का सबब बन सकती है।
नहींअधिकारियों के फोन
इस विषय पर जानकारी लेने के लिए अतिक्रमण प्रभारी नगर
निगम , आयुक्त नगर निगम को फोन लगाया गया तो फोन नहीं उठे

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