तकनीकी खामियों और सुरक्षा प्रोटोकॉल उल्लंघन की होगी जांचज
जबलपुर के बरगी बांध में हुए दर्दनाक क्रूज हादसे ने अब कानूनी, प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर बड़ा रूप ले लिया है। इस हादसे के बाद पूरे प्रदेश में संचालित क्रूज और बोट सेवाओं की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले में अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है, वहीं राज्य सरकार ने अपर मुख्य सचिव (ACS) की अध्यक्षता में हाई-लेवल जांच कमेटी गठित कर दी है।
यह मामला अब केवल एक हादसे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और जवाबदेही के मुद्दे पर बड़ी कानूनी लड़ाई बन चुका है।
हाईकोर्ट में जनहित याचिका, पूरे प्रदेश में क्रूज संचालन पर रोक की मांग
बरगी बांध हादसे को लेकर भोपाल निवासी सामाजिक कार्यकर्ता कमल कुमार राठी की ओर से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता हरप्रीत सिंह गुप्ता पैरवी करेंगे।
याचिका में मांग की गई है कि पूरे प्रदेश में संचालित क्रूज और मोटर बोट सेवाओं पर तत्काल रोक लगाई जाए, जब तक कि सुरक्षा मानकों की पूर्ण समीक्षा और पालन सुनिश्चित न हो जाए।
इस याचिका में राज्य शासन, केंद्र सरकार की मिनिस्ट्री ऑफ पोर्ट्स, शिपिंग एंड वॉटरवेज, एमपी टूरिज्म बोर्ड, इनलैंड वॉटरवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया, नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, कलेक्टर जबलपुर और पुलिस अधीक्षक समेत कुल आठ पक्षों को प्रतिवादी बनाया गया है।
“यह हादसा नहीं, प्रशासनिक विफलता” — याचिका में गंभीर आरोप
जनहित याचिका में साफ तौर पर कहा गया है कि बरगी क्रूज हादसा केवल प्राकृतिक आपदा नहीं था, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा नियमों की अनदेखी का परिणाम है।
याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिले “जीवन के अधिकार” का उल्लंघन बताया है। दावा किया गया है कि यदि सुरक्षा नियमों का पालन किया गया होता, तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
याचिका में राज्य सरकार और प्रशासन पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि जल पर्यटन गतिविधियों में सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी गई।
यात्रियों की संख्या को लेकर बड़ा खुलासा
याचिका में सबसे गंभीर आरोप यात्रियों की संख्या को लेकर लगाया गया है। रिकॉर्ड में केवल 29 टिकट जारी होने की बात सामने आई, जबकि हादसे के बाद मृतकों और बचाए गए लोगों की कुल संख्या 41 तक पहुंच गई।
इस अंतर को सीधे तौर पर निर्धारित क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाने और सुरक्षा नियमों के उल्लंघन से जोड़ा गया है।
यदि जांच में यह तथ्य सही पाया जाता है, तो यह क्रूज संचालन से जुड़े अधिकारियों और संचालकों की बड़ी लापरवाही मानी जाएगी।
मौसम विभाग के अलर्ट के बावजूद चलाया गया क्रूज
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि हादसे से पहले मौसम विभाग ने तेज आंधी और खराब मौसम को लेकर चेतावनी जारी की थी। इसके बावजूद क्रूज संचालन नहीं रोका गया।
आरोप है कि तेज हवाओं और ऊंची लहरों के बीच भी पर्यटकों को सफर कराया गया। इतना ही नहीं, यात्रियों को यात्रा शुरू होने से पहले पर्याप्त संख्या में लाइफ जैकेट भी उपलब्ध नहीं कराए गए थे।
याचिका के अनुसार, जब क्रूज में पानी भरना शुरू हुआ तब सुरक्षा इंतजामों को लेकर अफरा-तफरी मच गई। मौके पर पर्याप्त आपदा प्रबंधन और बचाव व्यवस्था भी मौजूद नहीं थी, जिसके कारण हादसा कुछ ही मिनटों में भयावह त्रासदी में बदल गया।
हादसे के बाद पूरे क्रूज को डिस्मेंटल किए जाने पर उठे सवाल
मामले में सबसे बड़ा विवाद हादसे के बाद सामने आया, जब जांच पूरी होने से पहले ही पूरे क्रूज को डिस्मेंटल किए जाने की जानकारी सामने आई।
इस घटनाक्रम ने जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि तकनीकी साक्ष्यों को नष्ट कर मामले को कमजोर करने की कोशिश की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े जल हादसे में तकनीकी जांच के लिए संबंधित वाहन या क्रूज को सुरक्षित रखा जाना चाहिए, ताकि उसकी संरचना, इंजन, संतुलन प्रणाली और सुरक्षा उपकरणों की वैज्ञानिक जांच की जा सके।
जिला अदालत पहले ही दे चुकी एफआईआर के निर्देश
इस पूरे मामले में जबलपुर की जिला अदालत पहले ही स्वतः संज्ञान ले चुकी है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी डी.पी. सूत्रकार ने थाना प्रभारी बरगी को एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू करने के निर्देश दिए थे।
हालांकि अब तक इस मामले में एफआईआर दर्ज होने की कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
यही कारण है कि अब यह मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है, क्योंकि सवाल उठ रहे हैं कि आखिर जिम्मेदारों पर कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है।
ACS की अध्यक्षता में हाई-लेवल जांच कमेटी गठित
बरगी हादसे के बाद राज्य सरकार ने हाई-लेवल जांच कमेटी का गठन किया है। जानकारी के अनुसार इस कमेटी की अगुवाई अपर मुख्य सचिव (ACS) कर रहे हैं।
कमेटी हादसे की परिस्थितियों, तकनीकी खामियों, सुरक्षा इंतजामों, मौसम विभाग के अलर्ट, प्रशासनिक जिम्मेदारी और प्रोटोकॉल उल्लंघन की जांच करेगी।
हालांकि इस जांच को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। कई सामाजिक संगठनों और लोगों का कहना है कि केवल छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर मामले को दबाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
अब हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी सबकी नजर
मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि जांच का दायरा और बढ़ेगा। अब केवल एफआईआर दर्ज कर मामले की इतिश्री नहीं हो सकेगी।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सुरक्षा मानकों, प्रशासनिक जिम्मेदारी, पर्यावरणीय अनुमति, यात्रियों की संख्या, तकनीकी जांच और आपदा प्रबंधन व्यवस्था जैसे कई गंभीर पहलुओं पर सवाल उठ सकते हैं।
यह जनहित याचिका हाईकोर्ट में सूचीबद्ध हो चुकी है और इसकी सुनवाई 11 मई 2026 को होने की संभावना है।
अब पूरे प्रदेश की नजर इस बात पर टिकी है कि जांच एजेंसियां और न्यायालय इस मामले में कितनी पारदर्शिता और सख्ती दिखाते हैं, क्योंकि बरगी हादसा अब केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि सिस्टम की जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन चुका है।

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