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Wednesday, April 22, 2026

संस्कारधानी जबलपुर में प्यासे संस्कार — गायब होते प्याऊ, पानी खरीदने को मजबूर लोग

 


प्रथम टुडे — सच की बात सबके साथ

जबलपुर। संस्कारधानी के नाम से पहचाने जाने वाले जबलपुर शहर में अब धीरे-धीरे संस्कार ही गायब होते नजर आ रहे हैं। कभी भीषण गर्मी में शहर के हर चौराहे, बाजार, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर मिट्टी के मटकों से ठंडा पानी पिलाने की परंपरा हुआ करती थी, जिसे लोग प्यार से "हिंद फ्रिज" कहते थे। राहगीर, मजदूर, रिक्शा चालक और यात्री इन प्याऊ से पानी पीकर अपनी प्यास बुझाते थे और शहर की सेवा भावना की मिसाल दी जाती थी।

लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। संस्कारधानी जबलपुर में गिने-चुने स्थानों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश प्याऊ पूरी तरह गायब हो चुके हैं। जहां पहले समाजसेवी संस्थाएं, व्यापारी संगठन और स्वयंसेवी लोग गर्मी में सेवा भाव से प्याऊ लगाते थे, अब वहां पानी की बोतल बेचने वाले ही नजर आते हैं।

स्टेशन से भी गायब हुई सेवा भावना

कभी रेलवे स्टेशन पर भी स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा यात्रियों को ठंडा पानी पिलाने की व्यवस्था रहती थी। मिट्टी के मटके और स्टील के गिलास के साथ सेवा करने वाले लोग गर्मी में राहत देते थे।

अब स्थिति यह है कि यात्रियों को पानी खरीदने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

सूत्रों के अनुसार, रेलवे स्टेशन पर लगी ठंडे पानी की मशीनें भी कई बार बंद रहती हैं। आरोप यह भी लगते रहे हैं कि कुछ स्थानों पर वेंडर द्वारा मशीन बंद कर दी जाती है, जिससे यात्रियों को मजबूरी में बोतलबंद पानी खरीदना पड़ता है।

मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा परेशान

इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर गरीब और मजदूर वर्ग पर पड़ रहा है।

रिक्शा चालक

ठेला चालक

मजदूर

राहगीर

छोटे कामगार

ये लोग पहले प्याऊ से मुफ्त पानी पीकर राहत पाते थे, लेकिन अब उन्हें पानी खरीदना पड़ रहा है या प्यासे ही काम करना पड़ता है।

कलेक्ट्रेट का वाटर कूलर भी बंद

शहर के प्रशासनिक केंद्र कलेक्ट्रेट परिसर में लगा ठंडे पानी का वाटर कूलर भी बंद पड़ा होने की शिकायत सामने आई है। जहां रोजाना सैकड़ों लोग काम से पहुंचते हैं, वहां ठंडे पानी की सुविधा का बंद होना चिंता का विषय बन गया है।

समाजसेवी संस्थाओं की चुप्पी

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि —

कहां गईं वे समाजसेवी संस्थाएं?

कहां गए वे व्यापारी संगठन?

कहां गई सेवा की वह परंपरा, जो संस्कारधानी की पहचान थी?

आज जरूरत है कि फिर से शहर में प्याऊ लगाने की परंपरा शुरू हो, ताकि भीषण गर्मी में लोगों को राहत मिल सके और संस्कारधानी की पहचान फिर जीवित हो सके।

प्रशासन और समाज से अपील

प्रमुख चौराहों पर प्याऊ लगाए जाएं

स्टेशन और बस स्टैंड पर ठंडे पानी की व्यवस्था हो

सरकारी दफ्तरों में वाटर कूलर चालू किए जाएं

समाजसेवी संस्थाएं आगे आएं

संस्कारधानी जबलपुर की पहचान सेवा और संस्कार से रही है — अब वक्त है कि शहर फिर से इस पहचान को वापस लाए।

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