महिला कांग्रेस में “एक पद का अपमान”, अंदर ही अंदर सुलग रहा असंतोष
जबलपुर | प्रथम टुडे
मध्यप्रदेश महिला कांग्रेस की नई कार्यकारिणी ने जबलपुर की राजनीति में भूचाल ला दिया है। पूरे प्रदेश में पदों की “बरसात” के बीच संस्कारधानी को मिला सिर्फ एक पद—वो भी संयुक्त सचिव। अब शहर में सवाल गूंज रहा है—क्या जबलपुर कांग्रेस में अब कोई वजनदार नेतृत्व बचा ही नहीं?
“एक पद” या राजनीतिक अपमान?
जहां भोपाल-इंदौर में पदों की भरमार है, वहीं कटनी, सतना, रीवा जैसे जिले भी जबलपुर से आगे निकल गए।
राजनीतिक गलियारों में इसे सीधे तौर पर “जबलपुर की अनदेखी” और “संगठनात्मक अपमान” कहा जा रहा है।
क्या गुटबाजी ने डुबो देगी नैया ?
अंदरखाने की चर्चा और भी तीखी है—
कहा जा रहा है कि एक पूर्व विधायक ने अपने गुट की महिला को किसी तरह एक पद दिलवाकर अपनी ताकत जरूर दिखा दी, लेकिन बाकी नेताओं की दावेदारी पूरी तरह ध्वस्त हो गई।
यानी साफ है — “जबलपुर में संगठन नहीं, गुट चल रहा है!”
“मेहनत हमारी, मलाई किसी और की!”
जबलपुर की कई महिला कार्यकर्ता, जो सालों से पार्टी के लिए जमीन पर काम कर रही थीं, इस फैसले से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं।
अंदरखाने से जो फीडबैक आ रहा है, वो साफ संकेत दे रहा है कि—
“नाराजगी अब चुप नहीं बैठेगी”
चुनाव से पहले फूट सकता है “सियासी बम”
भले ही चुनाव अभी दूर हों, लेकिन संगठन के भीतर यह असंतोष अगर बढ़ा, तो यह चुनाव के समय विस्फोटक रूप ले सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यही हाल रहा, तो इसका खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।
पड़ोसी जिले निकले आगे, जबलपुर रह गया पीछे
कटनी को ज्यादा तवज्जो
सतना-रीवा को मजबूत प्रतिनिधित्व
सागर भी आगे
भोपाल-इंदौर में पदों की “लाइन”
और जबलपुर? बस एक पद पर “समझौता”
प्रथम टुडे एक्सक्लूसिव निष्कर्ष
यह पूरा घटनाक्रम एक बात साफ कर रहा है—
जबलपुर कांग्रेस इस समय नेतृत्व संकट और गुटबाजी के दलदल में फंसी हुई है।
अगर जल्द ही संगठन में एकजुटता नहीं आई, तो आने वाले चुनावों में यह भीतरी लड़ाई ही सबसे बड़ी हार की वजह बन सकती है।




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