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Tuesday, April 21, 2026

विशेष रिपोर्ट: जबलपुर पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न; न्याय के लिए भटकता आम नागरिक


 प्रथम टुडे -सच की बात सब के साथ

जबलपुर। न्याय की आस में जब आम आदमी थाने की चौखट पर दस्तक देता है, तो उसे सुरक्षा का अहसास होना चाहिए। किंतु जबलपुर के गोरखपुर थाना क्षेत्र से जो खबरें आ रही हैं, वे पुलिस प्रशासन की साख और कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। यह मामला केवल एक थाने का नहीं, बल्कि पुलिस की पूरी चेन ऑफ कमांड और कानूनी जवाबदेही के पतन का संकेत दे रहा है।

संज्ञेय अपराध और विधिक अज्ञानता

​पुलिस प्रशिक्षण का आधार 'संज्ञेय' (Cognizable) और 'असंज्ञेय' अपराधों के बीच का अंतर समझना होता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173, 175 और 223 के तहत अधिकारियों को विस्तृत प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके बावजूद, गोरखपुर थाना प्रभारी नितिन कमल पर आरोप हैं कि वे संज्ञेय अपराधों में प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के बजाय आवेदकों को अदालतों के चक्कर लगाने पर मजबूर कर रहे हैं।

​हालिया मामला विनोद कुमार चाटे का है, जिन्हें FIR दर्ज कराने के लिए उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। माननीय न्यायालय ने 09-04-2026 को इस पर नोटिस जारी किया है। विडंबना यह है कि पुलिस व्यवस्था, जिसका कार्य अपराध रोकना है, अब केवल न्यायालय के आदेश पर जागती प्रतीत हो रही है।

​न्यायालय की अवमानना और प्रशासनिक उदासीनता

​रिपोर्ट्स के अनुसार, थाना प्रभारी नितिन कमल पूर्व में भी 'राजेंद्र सिंह पवार बनाम मध्य प्रदेश राज्य' के आदेशों की अनदेखी के चलते अवमानना याचिकाओं (Contempt Petition Nos. 3245/2025, 3243/2025, 3244/2025) में पक्षकार रहे हैं। तीन बार बिना शर्त माफी मांगने के बाद भी कार्यशैली में सुधार न होना, मध्य प्रदेश पुलिस रेगुलेशन एक्ट के रूल 64 और सिविल सेवा नियमों का खुला उल्लंघन प्रतीत होता है।

​"जब कानून लागू करने वाले ही बार-बार अदालत में माफी मांगकर आदेशों की अवहेलना करें, तो यह 'लॉ एंड ऑर्डर' की गरिमा के साथ एक भद्दा मजाक बन जाता है।"


विफल होती पुलिसिंग: डायल 112 और सोशल मीडिया की चुप्पी

​स्थानीय स्तर पर स्थिति और भी भयावह है। गोरखपुर थाना क्षेत्र की 'नर्मदा एवेन्यु' बिल्डिंग में अपराधियों के घुसने की घटना हो या आपातकालीन स्थिति, डायल 112 और थाने के फोन अक्सर अनुत्तरदायी पाए जाते हैं।

​प्रशासनिक पारदर्शिता का आलम यह है कि जबलपुर पुलिस के फेसबुक प्रोफाइल पर कमेंट बॉक्स बंद रखा गया है। यह जनता की आवाज को दबाने और संवादहीनता की पराकाष्ठा है। जब जनता अपनी समस्या सीधे पुलिस अधीक्षक (SP) तक नहीं पहुंचा सकती, तो लोकतंत्र में पुलिसिंग का क्या अर्थ रह जाता है?

जवाबदेही की कमी: पोस्टमैन की भूमिका में वरिष्ठ अधिकारी?

​कानूनी प्रक्रिया के अनुसार, यदि थाना प्रभारी सुनवाई न करे, तो नागरिक धारा 173(4) BNSS के तहत पुलिस अधीक्षक को आवेदन देता है। लेकिन आरोप है कि शिकायत को जांच के लिए पुनः उसी अधिकारी के पास भेज दिया जाता है जिसके खिलाफ शिकायत है। यह प्रक्रिया न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है। पुलिस अधीक्षक संपत उपाध्याय की इस पूरे मामले पर चुप्पी ने कई प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं।

निष्कर्ष: सुधार की अनिवार्य आवश्यकता

​जबलपुर में कानून-व्यवस्था को पुनः पटरी पर लाने के लिए अब कड़े फैसलों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। यदि स्थानीय अधिकारी और थाना प्रभारी अपनी विधिक जिम्मेदारियों को निभाने में विफल रहते हैं, तो प्रदेश के डीजीपी, मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप की मांग उठना स्वाभाविक है।

​जनता का विश्वास बहाल करने के लिए न केवल सक्षम और जवाबदेह नेतृत्व की जरूरत है, बल्कि उन अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई भी आवश्यक है जो न्यायालय के आदेशों को रद्दी का टुकड़ा समझते हैं।

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