लार्डगंज थाना बना चर्चाओं का केंद्र, पुलिस व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल
जबलपुर। जबलपुर पुलिस महकमे में इन दिनों लार्डगंज थाना एक बड़े विवाद और अंदरूनी कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अलग-अलग घटनाओं, पोस्टिंग और प्रशासनिक नियंत्रण को जोड़कर देखें तो मामला सिर्फ एक थाने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे हैं।बताया जा रहा है कि लार्डगंज थाना प्रभारी के रहते हुए भी एक एएसआई स्तर के अधिकारी का प्रभाव ज्यादा देखने को मिल रहा है, जिससे विभागीय अनुशासन और जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।
पाटन हत्याकांड के बाद पोस्टिंग पर उठे सवाल
गत वर्ष पाटन थाना क्षेत्र में जुआ विवाद को लेकर नौ हत्याओं का सनसनीखेज मामला सामने आया था। उस समय तत्कालीन थाना प्रभारी नवल आर्य को लेकर विभागीय कार्रवाई की चर्चा थी। हालांकि सूत्रों के मुताबिक जांच या अन्य जटिलताओं से बचाते हुए उन्हें सीधे लार्डगंज थाना प्रभारी बना दिया गया।
यह मामला उस समय विधानसभा से लेकर प्रदेश की राजनीति तक गूंजा था, लेकिन कुछ समय बाद मामला शांत हो गया। अब वही पोस्टिंग एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है।
नाम के टीआई, असली कंट्रोल वर्मा के पास ?
सूत्रों के अनुसार लार्डगंज थाने में नाम का थाना प्रभारी नवल आर्य हैं, लेकिन अंदरूनी चर्चा में एएसआई वर्मा के प्रभाव की बात सामने आ रही है।
बताया जा रहा है कि
वर्मा खुद को सीएसपी स्तर का प्रभावशाली बताते हैं
कई मामलों में फैसले लेने में उनका हस्तक्षेप बताया जाता है
पिछले छह महीनों से सादे कपड़ों में सक्रिय रहने की चर्चा
सूत्रों के मुताबिक वर्मा द्वारा यह तक कहे जाने की चर्चा है कि
"मेरा नाम वर्मा है, कप्तान से शिकायत कर लो, लाइन हाजिर कराओगे तो भी वर्मा ही रहूंगा, कप्तान से नहीं डरता।"
हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पुलिस विभाग में यह चर्चा का विषय बना हुआ है।
थाना प्रभारी का नियंत्रण कमजोर ?
बताया जाता है कि थाना प्रभारी व्यक्तिगत स्तर पर संबंध बेहतर रखते हैं, लेकिन अधीनस्थ स्टाफ पर नियंत्रण कमजोर नजर आता है।
कई मामलों में निर्णय प्रक्रिया प्रभावित होने की चर्चा
स्टाफ द्वारा स्थिति देखने के बावजूद चुप्पी
प्रशासनिक अनुशासन पर सवाल
पोस्टिंग नीति पर उठे बड़े सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं
क्या गंभीर घटनाओं के बाद भी मलाईदार पोस्टिंग मिलना सामान्य है ?
क्या विवादों के बावजूद पदस्थापना में समीकरण हावी हैं ?
क्या इसी कारण सिस्टम में अनुशासन कमजोर हो रहा है ?
जुड़ती कड़ियां: घमापुर, पनागर और जीएस ठाकुर मामला
लार्डगंज के साथ अन्य थानों के घटनाक्रम भी पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
घमापुर थाना
घमापुर टीआई से जुड़े कथित "कीड़ा निकाल देंगे" जैसे बयान ने पुलिस व्यवहार पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे पुलिस की कार्यशैली और भाषा को लेकर चर्चा तेज हुई है।
पनागर थाना
पनागर थाने में तीन कर्मियों के सस्पेंशन के बाद सवाल उठ रहे हैं
क्या यह सिर्फ कर्मचारियों की गलती थी ?
या पोस्टिंग नीति की खामी ?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी ?
जीएस ठाकुर घटनाक्रम
भाजपा नेता जीएस ठाकुर से जुड़े घटनाक्रम में भी आरोप लगे कि एसपी स्तर पर संवाद में कमी रही, जिससे पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े हुए।
जनता का भरोसा क्यों डगमगा रहा ?
सूत्रों के अनुसार अब लोग स्थानीय स्तर पर शिकायत करने के बजाय सीधे आईजी, डीआईजी और डीजीपी तक पहुंच रहे हैं। इसे पुलिस व्यवस्था पर भरोसे में कमी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
यदि समय रहते इन हालात पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो जबलपुर की कानून व्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है।
बड़ा सवाल — जिम्मेदारी कौन लेगा ?
अगर पोस्टिंग और कंट्रोल अलग-अलग हाथों में होगा तो जवाबदेही किसकी होगी ?
क्या सिस्टम खुद अपनी साख को नुकसान पहुंचा रहा है ?
क्या थानों में समानांतर नियंत्रण की स्थिति बन रही है ?
इन सवालों के बीच अब सभी की नजर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई पर टिकी हुई है।

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