प्रथम टुडे
जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर के पत्रकार संजय तिवारी एक बार फिर आस्था और संकल्प की यात्रा पर निकल रहे हैं। वे अपनी तीसरी नर्मदा परिक्रमा के लिए बुधवार को प्रस्थान करेंगे। इससे पूर्व वे दो बार अमरनाथ मंदिर की पवित्र यात्रा कर चुके हैं।
नर्मदा परिक्रमा का शुभारंभ वे ग्वारीघाट के दूसरी ओर स्थित गुरुद्वारा वाले घाट से करेंगे। यात्रा के दौरान वे मां नर्मदा के प्रमुख तीर्थ स्थलों और घाटों पर पूजन-अर्चन करते हुए परिक्रमा पूर्ण करेंगे तथा उद्गम स्थल अमरकंटक पहुंचकर पुनः जबलपुर लौटेंगे। यात्रा का समापन ग्वारीघाट पर ही होगा।
शांति, प्रगति और स्वच्छ नर्मदा का संदेश
संजय तिवारी ने प्रस्थान से पूर्व कहा कि उनका उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जबलपुर और पूरे देश में शांति, सौहार्द और प्रगति का संदेश देना है। वे परिक्रमा के दौरान लोगों से अपील करेंगे कि—
नर्मदा को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखें,
घाटों पर गंदगी न फैलाएं,
पर्यावरण संरक्षण को जीवन का हिस्सा बनाएं,
आपसी भाईचारे और सद्भाव के साथ समाज को आगे बढ़ाएं।
उन्होंने कहा कि नर्मदा परिक्रमा आत्मशुद्धि, अनुशासन और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भी प्रतीक है।
विशेष उल्लेख: पहले भी आस्था यात्राओं का अनुभव
संजय तिवारी इससे पूर्व दो बार अमरनाथ यात्रा कर चुके हैं, जहां उन्होंने देश में शांति, सद्भाव और आध्यात्मिक जागरूकता का संदेश दिया। इसके अलावा वे काशी (वाराणसी) की यात्रा तथा कुंभ मेले में भी सहभागी हो चुके हैं।
इस बार की नर्मदा परिक्रमा वे मोटरसाइकिल से पूरी करेंगे, जिससे यह यात्रा और भी अनुशासन, साहस और समर्पण का प्रतीक बनेगी। उनका मानना है कि यात्रा केवल दूरी तय करना नहीं, बल्कि समाज से संवाद और आत्मचिंतन का माध्यम है।
पत्रकार साथियों ने दी शुभकामनाएं
इस अवसर पर पत्रकार समुदाय ने उन्हें शुभकामनाएं देते हुए सफल और सुरक्षित यात्रा की कामना की। शुभकामना देने वालों में वरिष्ठ पत्रकार विवेक तिवारी, प्रवीण नामदेव, अनुराग दीक्षित, राजेंद्र दुबे, सोमेंद्र डंग, नील तिवारी, संदीप मनवारे, राजेंद्र थपलीयाल विवेक, बी.एल.रजक, शुभम श्रीवास्तव ,अन्य पत्रकार साथी उपस्थित रहे।
आस्था और सेवा का संगम
नर्मदा परिक्रमा केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि संयम, सेवा और समर्पण की साधना मानी जाती है। संजय तिवारी का यह संकल्प न केवल आध्यात्मिक है, बल्कि सामाजिक जागरूकता से भी जुड़ा है।
संस्कारधानी जबलपुर से प्रारंभ होकर अमरकंटक तक और पुनः ग्वारीघाट तक की यह यात्रा निश्चित रूप से आस्था, अनुशासन और सामाजिक संदेश का संगम

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