प्रथम टुडे जबलपुर।
शराब दुकानों में ग्राहकों से एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) से अधिक दर पर शराब बेचना कोई नई बात नहीं रही है, लेकिन अब इस अनियमितता का खुला वीडियो सामने आने के बाद आबकारी विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने न केवल शराब दुकानदारों की मनमानी को उजागर किया है, बल्कि आबकारी विभाग के कुछ अधिकारियों की भूमिका को भी शक के दायरे में ला दिया है।
क्या है वायरल वीडियो में?
वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि एक ग्राहक शराब की बोतल पर लिखी एमआरपी को लेकर दुकान में मौजूद सेल्समैन से बहस कर रहा है। जब ग्राहक कहता है कि "आबकारी विभाग ने एमआरपी से अधिक रेट पर शराब बेचने पर रोक लगा रखी है, तो आप अधिक दाम कैसे वसूल रहे हैं?", तो सेल्समैन उसे एक अन्य व्यक्ति के पास ले जाता है।
यह व्यक्ति, जो कि दुकान का जिम्मेदार प्रतीत हो रहा है, न सिर्फ ग्राहक की बात को दरकिनार करता है, बल्कि खुलेआम दावा करता है कि "आबकारी वाले मेरे रिश्तेदार हैं।" उसने एक महिला आबकारी अधिकारी का नाम भी लिया और कहा कि वे खुद दुकान में आती हैं। बहस के दौरान जब पैसे की बात उठाई गई, तो उस व्यक्ति ने साफ तौर पर कहा कि "पैसे तो लेंगे ही, घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो कैसे चलेगा।"
इस बयान ने सोशल मीडिया पर हड़कंप मचा दिया है और प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।
क्या कह रहा है आबकारी विभाग?
मीडिया द्वारा जब इस वायरल वीडियो पर प्रतिक्रिया लेने के लिए जिला सहायक आबकारी अधिकारी डी.सी. चतुर्वेदी से संपर्क किया गया, तो उन्होंने किसी भी प्रकार की अवैध उगाही से साफ इंकार किया। उन्होंने कहा कि:
"हमारा कोई भी अधिकारी न तो किसी प्रकार की रिश्वत लेता है और न ही किसी दुकान को एमआरपी से अधिक मूल्य पर शराब बेचने की छूट दी गई है। हमने पहले भी 51 दुकानों पर एमआरपी से अधिक दर पर शराब बेचने पर कार्यवाही की है।"
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी के पास ऐसे मामलों से जुड़ी प्रमाणिक शिकायत या वीडियो है तो वे तत्काल संज्ञान लेकर आवश्यक कार्रवाई करेंगे।
प्रशासन पर उठे सवाल
हालांकि आबकारी अधिकारी की बातों में विभाग की "सख्ती" का दावा है, लेकिन वायरल वीडियो में मौजूद व्यक्ति का बयान न केवल इस दावे को कमजोर करता है, बल्कि यह दर्शाता है कि कैसे दुकानें नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए ग्राहक को भी धमकाने या भ्रमित करने की स्थिति में पहुंच जाती हैं।
इस मामले में मुख्य चिंता की बात यह है कि जब खुद दुकानदार सार्वजनिक रूप से यह कहें कि "हमारे रिश्तेदार आबकारी में हैं" और "वो खुद दुकान पर आते हैं", तो निष्पक्ष जांच की मांग और अधिक प्रबल हो जाती है।

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