कांवड़ यात्रा: आस्था, परंपरा और तपस्या का अद्भुत संगम - Pratham Today, Sach Ki Baat SabKe Saath -->

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Monday, July 14, 2025

कांवड़ यात्रा: आस्था, परंपरा और तपस्या का अद्भुत संगम

 

संस्कारधानी जबलपुर के शिवालयों से बरसती है भोलेनाथ की कृपा

श्रावण मास में हर वर्ष संस्कारधानी जबलपुर से शुरू होने वाली ऐतिहासिक कांवड़ यात्रा, आस्था और परंपरा का अद्भुत प्रतीक है। यह यात्रा माँ नर्मदा तट गौरीघाट पर पूजन से प्रारंभ होती है और हजारों शिवभक्त भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए जल लेकर विभिन्न शिवालयों तक पहुँचते हैं।

कौन हैं आस्था के केंद्र
कैलाश धाम, कचनार सिटी, गुप्तेश्वर, साकेत धाम, पशुपति नाथ (भेड़ाघाट), त्रिशूल घाट (चरगंवा), बगलेश्वर महादेव और नर्मदेश्वर भोलेनाथ जैसे प्रमुख शिवालय कांवड़ियों की आस्था के केंद्र हैं। मान्यता है कि इन स्थानों पर जलाभिषेक करने से वैसा ही पुण्य प्राप्त होता है जैसा देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में दर्शन-पूजन से होता है।

पौराणिक मान्यताएं और परंपरा
कहते हैं कि त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने सबसे पहले कांवड़ यात्रा की थी। वहीं भगवान श्रीराम द्वारा सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर बाबा बैद्यनाथ का अभिषेक करने की कथा भी प्रसिद्ध है। यही परंपरा आज श्रद्धा और समर्पण का स्वरूप बन चुकी है।

कांवड़ यात्रा का महत्व
इस यात्रा से न केवल पापों का नाश और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है, बल्कि यह भक्तों में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मिक संतोष और समाज के लिए सेवा का भाव भी जाग्रत करती है। विशेष रूप से संतान प्राप्ति और मानसिक शांति के लिए यह यात्रा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

संस्कारधानी की विशेष पहचान
जबलपुर की कांवड़ यात्रा की एक खास बात यह भी है कि इसमें पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी निहित है। भक्त नर्मदा जल के साथ पौधे लेकर चलते हैं और उन्हें पहाड़ी क्षेत्रों में रोपित करते हैं। यह भक्ति के साथ प्रकृति सेवा का सुंदर उदाहरण है।

मान्यता है कि भोलेनाथ की कृपा से संस्कारधानी में आपदाएं नहीं आतीं और नगर में सुख-शांति बनी रहती है।

संजय मिश्रा

सहायक जनसंपर्क अधिकारी, नगर निगम जबलपुर

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