मध्य प्रदेश सरकार ने हाल ही में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बजट में उल्लेखनीय प्रावधान किए हैं। कागज़ों पर यह एक महत्वाकांक्षी दृष्टि का संकेत देता है—जहां राज्य खुद को “पर्यटन हब” के रूप में स्थापित करना चाहता है। लेकिन जबलपुर के बरगी डैम में हुआ हालिया हादसा इस पूरे दावे पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सरकारी प्राथमिकताओं की असलियत को उजागर करने वाली त्रासदी है। बरगी डैम में पर्यटकों से भरी क्रूज नाव का पलटना और 11 लोगों की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। यह हादसा उस समय हुआ जब मौसम खराब था और तेज हवाओं की आशंका पहले से मौजूद थी। इसके बावजूद क्रूज संचालन जारी रहा—यही वह बिंदु है जहां सवाल उठना स्वाभाविक है।
कड़वा सवाल: क्या यह सिर्फ लापरवाही थी, या फिर एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा, जिसमें “पर्यटन” को “सुरक्षा” से ऊपर रखा गया?
प्रशासनिक विफलता:
प्रत्यक्षदर्शियों और बचे हुए लोगों के अनुसार, कई यात्रियों को लाइफ जैकेट समय पर नहीं दी गई। यहां तक कि कुछ मामलों में यह आरोप भी सामने आया कि जैकेट तब बांटी गई जब नाव डूबने लगी थी। अगर यह सच है, तो यह केवल चूक नहीं, बल्कि सीधी प्रशासनिक विफलता है।
दिखावा बनाम सुरक्षा:
सरकार हर साल पर्यटन के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करती है—नई परियोजनाएं, क्रूज सेवाएं, वाटर स्पोर्ट्स और प्रचार अभियान। लेकिन बरगी डैम की यह घटना बताती है कि इस खर्च का बड़ा हिस्सा “दिखावे” पर है, “सुरक्षा” पर नहीं। विकास का असली पैमाना केवल यह नहीं कि कितने पर्यटक आए, बल्कि यह है कि वे कितने सुरक्षित लौटे।
हर हादसे के बाद वही परंपरागत प्रतिक्रिया सामने आती है—जांच के आदेश, मुआवजे की घोषणा और कुछ निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई। बरगी हादसे के बाद भी सरकार ने क्रूज संचालन पर रोक लगाई और जांच के आदेश दिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोक पाएगी, या फिर यह भी अन्य फाइलों की तरह ठंडी पड़ जाएगी?
निष्कर्ष:
इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पर्यटन नीति में एक गंभीर खामी है—जहां “आर्थिक लाभ” प्राथमिकता है और “मानव जीवन” द्वितीयक। अगर पर्यटन को सच में बढ़ावा देना है, तो सबसे पहले सुरक्षा को अनिवार्य और अटल बनाना होगा। हर नाव, हर क्रूज और हर पर्यटन स्थल पर सख्त नियम लागू करने होंगे—बिना किसी समझौते के।
रिपोर्ट: प्रथम टुडे न्यूज़ पोर्टल
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