जबलपुर बरगी डैम में हुई 13 मौतों ने केवल जलस्तर नहीं बढ़ाया, बल्कि प्रशासन के चेहरे पर पुती उस कालिख को उजागर कर दिया है जिसे अब 'सबूतों को मिटाकर' धोने की कोशिश की जा रही है। यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र द्वारा की गई एक 'नियोजित हत्या' प्रतीत होती है, जहाँ सुरक्षा नियमों को फाइलों में दफन कर इंसानी जानों से जुआ खेला गया।
साक्ष्यों का कत्ल: जांच से पहले क्रूज को कबाड़ में क्यों बदला?
सबसे सनसनीखेज सवाल उस 'क्रूज' को लेकर है जो इस त्रासदी का चश्मदीद था। जांच की आंच आला अधिकारियों तक न पहुंचे, इसलिए आनन-फानन में उस क्रूज को डिस्मेंटल (तोड़ना) कर दिया गया।
- सवाल: फॉरेंसिक जांच और तकनीकी मुआयने से पहले सबूतों को नष्ट करने की अनुमति किसने दी?
- आरोप: क्या यह कबाड़ बनाने की प्रक्रिया असल में उन सुरागों को मिटाने की कोशिश थी, जो अफसरों की गर्दन तक पहुँच सकते थे?
CM के स्वागत के लिए थमीं सांसें: क्या 'इमेज मैनेजमेंट' के लिए रुकी थी जिंदगी?
सूत्रों का दावा रोंगटे खड़े कर देने वाला है। बताया जा रहा है कि जब डूबे हुए लोग जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे थे, तब मुख्यमंत्री के आगमन के 'शो' के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन को आधे घंटे तक रोक दिया गया।
कठोर सत्य: अगर यह सच है, तो यह आधुनिक इतिहास का सबसे अमानवीय कृत्य है। क्या प्रशासन की प्राथमिकता डूबी हुई सांसें बचाना था या मुख्यमंत्री के सामने 'एक्टिव' दिखने का पाखंड करना? उन कीमती 30 मिनटों की कीमत 13 परिवारों की तबाही से चुकाई गई है।
जश्न में डूबे हुक्मरान: जब रक्षक ही बने नियमों के भक्षक!
10 अप्रैल की वह बैठक प्रशासन के खोखलेपन की गवाही दे रही है। सी ओ अभिषेक गहलोत और 50 आला अधिकारियों की फौज बरगी डैम पर लंच और केक काटने में मशगूल थी। वीडियो प्रमाण चीख-चीख कर कह रहे हैं कि नियम सिर्फ आम जनता के लिए हैं। * भारी भरकम वेतन पाने वाले इन अधिकारियों ने न लाइफ जैकेट पहनी, न सुरक्षा मानकों की सुध ली।
- जब रक्षक ही नियमों की धज्जियां उड़ाएंगे, तो नीचे का अमला मौत का सामान क्यों नहीं परोसेगा?
खराब इंजन, मरता सिस्टम: जानबूझकर मौत के कुएं में धकेला?
क्रूज के पायलट महेश पटेल का बयान इस पूरे मामले की 'डेथ वारंट' है। जब एक इंजन पहले से ही दम तोड़ चुका था, तो उस कबाड़ को पानी में उतारा ही क्यों गया?
- पर्यटन विभाग की यह आपराधिक चुप्पी क्या कमीशनखोरी का नतीजा थी?
- क्या अधिकारियों को 13 मौतों का अंदेशा नहीं था, या उन्होंने मान लिया था कि 'गरीब की जान सस्ती है'?
बलि का बकरा कौन?
जबलपुर का यह हादसा सिस्टम की सड़न का जीता-जागता प्रमाण है। अब सवाल यह है कि क्या हर बार की तरह किसी छोटे कर्मचारी या पायलट को जेल भेजकर फाइल बंद कर दी जाएगी? या फिर उन सफेदपोश और वातानुकूलित कमरों में बैठे 'साहबों' पर गाज गिरेगी जिन्होंने इस मौत के मंजर की पटकथा लिखी है?
यह 13 मौतें नहीं, प्रशासनिक तंत्र द्वारा किया गया सामूहिक संहार है। जवाब तो देना होगा!

No comments:
Post a Comment