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Sunday, April 26, 2026

हाईकोर्ट में 'बेंच-बार' टकराव: जज की टिप्पणी से आहत महिला वकील ने चीफ जस्टिस से लगाई गुहार

 

जबलपुर | 

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में एक बार फिर बेंच और बार के बीच तल्खी सामने आई है। जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया की अदालत में सुनवाई के दौरान हुई कथित अभद्र टिप्पणियों से व्यथित होकर महिला अधिवक्ता डॉली सोनी ने मुख्य न्यायाधीश (CJ) को प्रतिवेदन सौंपकर प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग की है। मामला अब कानूनी गलियारों में न्यायिक गरिमा और अधिवक्ताओं के सम्मान की बहस का केंद्र बन गया है।

​जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान बढ़ा विवाद

​जानकारी के अनुसार, विवाद अग्रिम जमानत याचिका (MCRC No. 18067/2026) की सुनवाई के दौरान शुरू हुआ। अधिवक्ता डॉली सोनी 67 वर्षीय विजय शंकर कनकने का पक्ष रख रही थीं, जिन पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 के तहत मामला दर्ज है। अधिवक्ता का तर्क था कि इसी मामले के तीन सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है, अतः 'पैरिटी' (समानता) के आधार पर उनके मुवक्किल को भी राहत मिलनी चाहिए।

​'गरिमा के खिलाफ थीं टिप्पणियां'

​महिला अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि सुनवाई के दौरान जब अदालत ने याचिका खारिज करने के संकेत दिए, तब कुछ ऐसी व्यक्तिगत और तीखी टिप्पणियां की गईं जो एक महिला अधिवक्ता की पेशेवर और व्यक्तिगत गरिमा के अनुरूप नहीं थीं। प्रतिवेदन में कहा गया है कि इन टिप्पणियों से आहत होकर अंततः याचिकाकर्ता को अपनी याचिका वापस लेनी पड़ी।

"अदालतों में अब आदेशों से ज्यादा जज की टिप्पणियों से डर लगने लगा है।" > — कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय


​केस के मेरिट पर भी उठाए सवाल

​अधिवक्ता ने अपने प्रतिवेदन में कानूनी विसंगतियों का भी उल्लेख किया है। उनका तर्क है कि:

  • धारा 108 का दुरुपयोग: आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला तब बनता है जब घटना घटित हो, जबकि इस मामले में शिकायतकर्ता जीवित है।
  • देरी से FIR: एफआईआर दर्ज होने में तीन महीने का विलंब मामले को संदेहास्पद बनाता है, जिस पर अदालत ने गौर नहीं किया।

​सुप्रीम कोर्ट की नसीहत: "जजमेंट दें, जजमेंटल न बनें"

​यह मामला ऐसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही 'न्यायिक संयम' (Judicial Restraint) पर सख्त रुख अपना चुका है। शीर्ष अदालत ने इलेक्शन कमीशन बनाम एम. विजयभास्कर मामले में स्पष्ट किया था कि न्यायाधीशों को कठोर मौखिक टिप्पणियों से बचना चाहिए। हाल ही में हाईकोर्ट्स को चेतावनी दी गई थी कि मौखिक टिप्पणियां अक्सर न्यायिक आदेशों की मूल भावना को प्रभावित करती हैं।

​मुख्य न्यायाधीश से हस्तक्षेप की मांग

​अधिवक्ता डॉली सोनी ने मुख्य न्यायाधीश से मांग की है कि भविष्य में अधिवक्ताओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि हाईकोर्ट प्रशासन इस गंभीर शिकायत पर क्या रुख अपनाता है।

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