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Tuesday, February 17, 2026

छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड: 30 मासूमों की मौत मामले में मुख्य आरोपी डॉ. प्रवीण सोनी की जमानत खारिज

 हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी – “यह सामान्य लापरवाही नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य से खिलवाड़”


जबलपुर/छिंदवाड़ा, 17 फरवरी 2026।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने छिंदवाड़ा के बहुचर्चित कफ सिरप कांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी डॉ. प्रवीण सोनी की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। इस मामले में 30 से अधिक मासूम बच्चों की मौत हुई थी। अदालत ने मामले को अत्यंत गंभीर और संवेदनशील बताते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों में जमानत देना न्यायोचित नहीं होगा।

जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने सुनवाई के बाद यह स्पष्ट किया कि यह मामला सामान्य मेडिकल लापरवाही का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ गंभीर स्तर पर लापरवाही और जोखिम से जुड़ा है। कोर्ट ने डॉ. प्रवीण सोनी के साथ सह-आरोपी सौरभ कुमार जैन, राजेश कुमार सोनी और डॉक्टर की पत्नी ज्योति सोनी की जमानत याचिकाएं भी खारिज कर दीं। यह आदेश 2 फरवरी को सुरक्षित रखा गया था, जिसे 17 फरवरी को जारी किया गया।

जहरीली ‘कोल्ड्रिफ’ सिरप बनी मौत की वजह

जांच में सामने आया कि बीमार बच्चों को ‘कोल्ड्रिफ’ नामक कफ सिरप दी गई थी। सरकारी प्रयोगशाला की रिपोर्ट में इस सिरप में 46.28 प्रतिशत डायथिलीन ग्लाइकोल (DEG) पाया गया, जबकि इसकी सुरक्षित सीमा मात्र 0.1 प्रतिशत निर्धारित है।

विशेषज्ञों के अनुसार, DEG शरीर में पहुंचने पर किडनी को गंभीर रूप से प्रभावित करता है और बच्चों में तेजी से किडनी फेलियर का कारण बन सकता है। इसी वजह से दर्जनों बच्चों की हालत बिगड़ी और उनकी मौत हो गई।

पहले मिली थी चेतावनी, फिर भी जारी रहा प्रिस्क्रिप्शन

अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि नागपुर के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. प्रवीण खापेकर ने 11 सितंबर 2025 को फोन पर संभावित खतरे की चेतावनी दी थी। उन्होंने बच्चों के लक्षणों को 1998 के दिल्ली कफ सिरप कांड से मिलते-जुलते बताया था, जिसमें 33 बच्चों की मौत हुई थी।

इसके बावजूद आरोपी डॉक्टर ने संबंधित सिरप लिखना बंद नहीं किया।

साथ ही, दिसंबर 2023 में केंद्र सरकार ने 4 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए कुछ फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन दवाओं पर प्रतिबंध लगाया था, लेकिन इस प्रतिबंध के पालन में भी गंभीर लापरवाही सामने आई।

आर्थिक लाभ का एंगल: पत्नी के मेडिकल स्टोर से दवा दिलाने के आरोप

मामले में आर्थिक लाभ की बात भी सामने आई है। जांच एजेंसियों के अनुसार, डॉ. प्रवीण सोनी की पत्नी ज्योति सोनी क्लिनिक के पास स्थित एक मेडिकल स्टोर संचालित करती हैं। आरोप है कि मरीजों के परिजनों पर उसी दुकान से दवा खरीदने का दबाव बनाया जाता था और प्रत्येक सिरप की बोतल पर लगभग 10 प्रतिशत कमीशन लिया जाता था।

जांच में यह भी सामने आया है कि जब बच्चों की मौत के मामले सामने आने लगे, तब संदिग्ध दवाओं का स्टॉक खत्म करने और संभावित सबूत मिटाने की कोशिश की गई। पुलिस इस पहलू की भी गहन जांच कर रही है।

बचाव पक्ष की दलीलें कोर्ट ने नहीं मानी

बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि डॉक्टर केवल दवा लिख रहे थे और यदि सिरप में मिलावट थी तो इसकी जिम्मेदारी निर्माता कंपनी की है। हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि जब संभावित खतरे की जानकारी और चेतावनी पहले से मौजूद थी, तब भी दवा लिखना गंभीर लापरवाही और आपराधिक जिम्मेदारी के दायरे में आता है।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

30 से अधिक बच्चों की मौत ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था, दवा नियंत्रण प्रणाली और निजी चिकित्सा प्रैक्टिस पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख को ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मामला फिलहाल पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है और आगे की जांच तथा ट्रायल पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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