गवाह की बयानबाजी से बदल गया पूरा मामला, हाई कोर्ट ने दी जमानत
प्रथम टुडे | सच की बात सब के साथ
जबलपुर।
दमोह कोतवाली पुलिस द्वारा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत दर्ज एक चर्चित मामले में हाई कोर्ट से बहुप्रतीक्षित राहत मिलने के बाद 44 वर्षीय कैलाश सिंह ठाकुर आखिरकार लगभग आठ महीने की जेल अवधि के बाद रिहा हो गया। इस मामले में पुलिस की पूरी कहानी तब सवालों के घेरे में आ गई, जब ट्रायल कोर्ट में एक महत्वपूर्ण गवाह के बयान ने पूरे घटनाक्रम की दिशा ही बदल दी।
इस प्रकरण की पैरवी अधिवक्ता विवेक तिवारी ने की, जिन्होंने तथ्यात्मक आधार पर अदालत के सामने नई दृष्टि प्रस्तुत की।
गवाह ने तोड़ी पुलिस की कहानी, अदालत में खुला पूरा सच
17 मई 2025 को दमोह पुलिस ने कैलाश सिंह ठाकुर को अरबाज खान और मोनू रैकवार के साथ गिरफ्तार किया था। पुलिस दावा करती थी कि तीनों के पास से तीन हथगोले बरामद किए गए हैं और वे किसी बड़ी घटना की फिराक में थे।
पुलिस ने छह सरकारी गवाहों के साथ एक स्थानीय युवक सरफराज खान को भी “राहगीर गवाह” बनाया था।
लेकिन जब सरफराज ने अदालत में गवाही दी, तो पुलिस की पूरी कहानी धराशायी हो गई।
सरफराज का बयान—
वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं था
उसने न किसी बरामदगी को अपनी आंखों से देखा
न ही आरोपियों को कभी पहचानता था
इस एक गवाही ने पूरे मामले की संरचना बदल दी और केस की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा किया।
दो बार जमानत खारिज, तीसरी बार मिला न्याय का रास्ता
कैलाश का जमानत आवेदन निचली अदालत से खारिज होने के बाद हाई कोर्ट पहुंचा।
उच्च न्यायालय में भी दो बार जमानत याचिका खारिज हुई।
कैलाश की जेल अवधि लगातार बढ़ती जा रही थी और उसके परिवार की उम्मीदें लगभग टूट चुकी थीं।
इसी बीच कैलाश की वृद्ध मां ने अधिवक्ता विवेक तिवारी से संपर्क किया और अपने बेटे की बेगुनाही का पक्ष रखते हुए सारे दस्तावेज सौंपे।
इसके बाद अधिवक्ता तिवारी ने अपनी टीम के साथ—
केस की पूरी पुलिस फ़ाइल खंगाली
विस्फोटक अधिनियम के प्रावधानों का अध्ययन किया
गवाहों के विरोधाभास की पड़ताल की
तीसरी बार जमानत आवेदन दायर किया गया और 11 जनवरी को माननीय न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल की अदालत में बहस हुई। अदालत ने कैलाश को जमानत का लाभ प्रदान किया।
कैलाश की मां का संघर्ष: “मेरा बेटा बेगुनाह है”
करीब आठ महीनों तक कैलाश की मां हर दिन एक ही सवाल पूछती रही—
“आज मेरे बेटे की रिहाई होगी क्या?”
शीतकालीन अवकाश के चलते जमानत सुनवाई में देरी भी हुई, लेकिन दिन-प्रतिदिन की बेचैनी के बीच परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी।
आखिरकार हाई कोर्ट से राहत मिली, और कैलाश जेल से बाहर आकर अपने परिजनों से मिला।
दमोह पुलिस की ‘सूचना’ और कोर्ट में टिक न पाई कहानी
पुलिस की FIR के अनुसार—
पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली
पुलिस टीम सरकारी वाहन में मौके पर पहुंची
रास्ते से सरफराज को “पंच गवाह” बना साथ ले गई
मैदान में तीन लोग एक थैले में हथगोले लिए खड़े थे
तलाशी में तीन हथगोले बरामद हुए
लेकिन अदालत में सरफराज के बयान ने पुलिस कथा को कमजोर कर दिया।
क्योंकि पंच गवाह की भूमिका का ही आधार अदालत में सिद्ध नहीं हो पाया।
अधिवक्ता विवेक तिवारी और टीम की भूमिका
जमानत की सुनवाई के दौरान—
अधिवक्ता विवेक तिवारी
अधिवक्ता निशांत मिश्रा
अधिवक्ता मोहसिन खान
मुख्य बिंदु
दमोह पुलिस ने कैलाश सहित 3 आरोपियों को हथगोला रखने के आरोप में गिरफ्तार किया था
ट्रायल कोर्ट में गवाह के पलटने से पुलिस की कहानी कमजोर पड़ी
दो बार जमानत खारिज हुई, तीसरे प्रयास में हाई कोर्ट से मंजूरी
अधिवक्ता विवेक तिवारी और टीम ने केस को नए तथ्यात्मक दृष्टिकोण से पेश किया
आठ महीने जेल में रहे कैलाश को आखिर मिली राहत
अधिवक्ता विवेक तिवारी
इस केस में महत्वपूर्ण बात यह रही की मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत कार्यवाही करने का दावा किया, दमोह पुलिस ने दबाव डालकर राह चलते सरफराज खान नाम के व्यक्ति को गवाह बनाने का दावा किया, और कैलाश ठाकुर समेत दो लोगों को इस झूठी कार्यवाही में जेल भेज दिया गया, लेकिन जब बारी अदालत की आई और गवाह के तौर पर सरफराज खान को बुलाया गया तो उसने कहा कि ना तो मैं आरोपियों को जानता हूं और ना मेरे सामने कोई कार्रवाई हुई है।यह जो हस्ताक्षर जप्ती पंचनामा में दिखाए जा रहे हैं यह तो मैने एक आवेदन में किए थे, आगे इस प्रकरण में यह पता चला कि तीनों आरोपियों के साथ पुलिस की एक दिन पहले बहस हुई थी, शायद इसी बहस का बदला लेने के लिए दमोह की कोतवाली पुलिस ने झूठी कहानी रचते हुए यह पूरा खेल रच दिया। माननीय अदालत के सामने इसी गवाही को सामने रखा गया और केस पूरी तरह से पलट गया और सच्चाई सामने आ गई।


No comments:
Post a Comment