डिजिटल ट्रांजैक्शन की आड़ में ठगों का बड़ा खेल, शिकायत और कार्रवाई के बीच की देरी बनी सबसे बड़ी कमजोरी
प्रथम टुडे
जबलपुर। जिले में साइबर अपराध की बढ़ती घटनाओं ने पुलिस व्यवस्था और डिजिटल निगरानी प्रणाली की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। वर्ष 2025 के दौरान साइबर ठगों ने 93 प्रायमरी बैंक खातों का इस्तेमाल कर करीब 12 करोड़ 74 लाख रुपये की ठगी को अंजाम दिया, लेकिन अब तक की कार्रवाई में महज 55 लाख 68 हजार रुपये ही रिकवर हो सके हैं। यानी करोड़ों रुपये सिस्टम की आंखों के सामने से फिसल गए।
सूत्रों के अनुसार, साइबर ठगी के इन मामलों में ठगों ने फर्जी लिंक, ओटीपी फ्रॉड, कॉल के जरिए बैंकिंग जानकारी हासिल कर खातों का दुरुपयोग किया। रकम को बेहद कम समय में कई खातों में ट्रांसफर किया गया, जिससे ट्रांजैक्शन की चेन तो बनी, लेकिन कार्रवाई से पहले पैसा गायब हो गया।
शिकायत और कार्रवाई के बीच बना ‘सेफ ज़ोन’
सूत्र बताते हैं कि अधिकांश मामलों में पीड़ितों द्वारा शिकायत दर्ज कराने और खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया के बीच का समय ठगों के लिए सेफ ज़ोन साबित हुआ। इसी देरी का फायदा उठाकर साइबर अपराधियों ने रकम अन्य खातों में स्थानांतरित कर दी। नतीजतन, बाद में की गई कार्रवाई सिर्फ कागजी बनकर रह गई।
तकनीकी संसाधनों और समन्वय की कमी
जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि साइबर अपराध से निपटने के लिए जरूरी तकनीकी संसाधन, विशेषज्ञता और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी भी रिकवरी में बड़ी बाधा बनी। कई मामलों में ट्रांजैक्शन ट्रेस तो हुआ, लेकिन समय रहते निर्णायक कार्रवाई नहीं हो सकी।
पीड़ित परेशान, जवाबदेही तय नहीं
करोड़ों की ठगी के बावजूद पीड़ित आज भी अपनी गाढ़ी कमाई वापस पाने के लिए भटक रहे हैं। सवाल यह है कि जब डिजिटल ट्रांजैक्शन का पूरा रिकॉर्ड सिस्टम में मौजूद रहता है, तो करोड़ों रुपये आखिर किसकी लापरवाही से हाथ से निकल गए? अब तक इस पर कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
जागरूकता की अपील, लेकिन ठग एक कदम आगे
पुलिस और साइबर सेल की ओर से नागरिकों को जागरूक रहने, अनजान कॉल, लिंक और मैसेज से बचने की अपील जरूर की जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि साइबर ठग हर नए तरीके से सिस्टम से एक कदम आगे निकलते दिख रहे हैं, जबकि व्यवस्था अब भी प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई तक सीमित नजर आ रही है।

No comments:
Post a Comment