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Wednesday, April 29, 2026

कानूनी नज़रिया: 'सहमति से बने दीर्घकालिक संबंध रेप नहीं', इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

 

प्रयागराज: प्रथम टुडे जबलपुर 

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 'सहमति' और 'रेप' के बीच के कानूनी अंतर को स्पष्ट करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने एक कथित बलात्कार के मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका मंजूर करते हुए स्पष्ट किया कि यदि दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक आपसी सहमति से शारीरिक संबंध में रहते हैं, तो उसे बाद में बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

​यह ऐतिहासिक आदेश जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने दिया है।

मामला क्या था?

​यह मामला उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के सिधारी थाने से जुड़ा है। यहाँ एक विधवा महिला ने एक व्यक्ति के खिलाफ गंभीर धाराओं में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी। आरोपी याचिकाकर्ता ने गिरफ्तारी से बचने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अग्रिम जमानत की मांग की।

​बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि पीड़िता और आरोपी साल 2022 से एक-दूसरे के संपर्क में थे और उनके बीच प्रेम संबंध थे, जो सहमति पर आधारित थे।

महिला ने किन धाराओं में दर्ज कराया था केस?

​खबर के अनुसार, कथित पीड़िता ने आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की निम्नलिखित अलग-अलग और गंभीर धाराओं के तहत FIR दर्ज कराई थी:

  • BNS की धारा 64: यह धारा बलात्कार (Rape) से संबंधित है।
  • BNS की धारा 115(2): यह स्वेच्छा से चोट पहुँचाने (Voluntarily causing hurt) के लिए सजा से संबंधित है।
  • BNS की धारा 351(3): यह आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation) से संबंधित है, जिसमें मौत या गंभीर चोट की धमकी देना शामिल है (जैसा कि इस मामले में बंदूक की नोक का आरोप था)।

कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और विरोधाभास

​अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि पीड़िता द्वारा पुलिस को दिए गए अलग-अलग बयानों में काफी विरोधाभास (Contradictions) थे, जिसके कारण अभियोजन पक्ष की कहानी संदिग्ध प्रतीत हुई:

  • बयानों में अंतर: कोर्ट ने नोट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 183 के तहत दर्ज महिला का बयान उसकी खुद की FIR की कहानी से बिल्कुल अलग था। धारा 183 के बयान में आपसी सहमति और लंबे समय से चल रहे प्रेम संबंध की बात सामने आई।
  • मेडिकल रिपोर्ट: मेडिकल जांच के दौरान भी डॉक्टर को दिए गए बयानों में यह बात सामने आई कि दोनों साल 2024 से एक-दूसरे के साथ रिश्ते में थे।
  • सहमति का आधार: सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद, कोर्ट ने माना कि सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय से चले आ रहे शारीरिक संबंधों को 'रेप' नहीं कहा जा सकता। कोर्ट की राय में, धारा 183 के तहत दर्ज बयान में प्रेम संबंध का पता चलता है।

सशर्त अग्रिम जमानत मंजूर

​कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष की कहानी में प्रथम दृष्टया संदेह है और आरोपी का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने आरोपी की सशर्त अग्रिम जमानत अर्जी मंजूर कर ली। कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी पुलिस जांच में पूरी तरह सहयोग करेगा।

कानूनी Fact Box: BNS और पुराने IPC का संबंध

​पाठकों की समझ के लिए, यहाँ नए कानून (BNS) की धाराओं का पुराने कानून (IPC) से संबंध दिया गया है:

  • BNS 64 (बलात्कार): पुराने कानून में IPC 376
  • BNS 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना): पुराने कानून में IPC 323
  • BNS 351(3) (आपराधिक धमकी): पुराने कानून में IPC 506

मुख्य बिंदु:

  • अदालत: इलाहाबाद हाई कोर्ट (जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला)।
  • सिद्धांत: बालिगों के बीच लंबे समय तक सहमति से बने संबंध रेप की श्रेणी में नहीं आते।
  • राहत: आरोपी को इन गंभीर धाराओं के बावजूद मिली अग्रिम जमानत।

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